Thursday, 20 September 2012

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 33rd dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 तैंतीसवीं दुआ
दुआए इस्तेख़ारह
 
बारे इलाहा! मैं तेरे इल्म के ज़रिये तुझसे ख़ैर व बहबूद चाहता हूँ। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे लिये अच्छाई का फ़ैसला सादर फ़रमा, और हमारे दिल में अपने फ़ैसले (की हिकमत व मसलेहत) का अलक़ा कर और उसे एक ज़रिया क़रार दे के हम तेरे फ़ैसले पर राज़ी रहें और तेरे हुक्म के आगे सरे तस्लीम ख़म करें, इस तरह हमसे शक की ख़लिश दूर कर दे और मुख़लेसीन का यक़ीन हमारे अन्दर पैदा करके हमें तक़वीयत दे और हमें ख़ुद हमारे हवाले न कर दे के जो तूने फ़ैसला किया है उसकी मग़फ़ेरत से आजिज़ रहें और तेरी क़ुदरत व मन्ज़िलत को सुबुक समझें और जिस चीज़ से तेरी रज़ा वाबस्ता है उसे नापसन्द करें और जो चीज़ अन्जाम की ख़ूबी से दूर और आफ़ियत की ज़द से क़रीब हो उसकी तरफ़ माएल हो जाएं। तेरे जिस फ़ैसले को हम नापसन्द करें वह हमारी नज़रों में पसन्दीदा बना दे और जिसे हम दुश्वार समझें उसे हमारे लिये सहल व आसान कर दे और जिस मशीयत व इरादे को हमसे मुताल्लुक़ किया है उसकी इताअत हमारे दिल में अलक़ा कर। यहां तक के जिस चीज़ में तूने ताजील की है उसमें ताख़ीर और जिसमें ताख़ीर की है उसमें ताजील न चाहें और जिसे तूने पसन्द किया है उसे नापसन्द और जिसे नागवार समझा है उसे इख़्तेयार न करें। और हमारे कामों का उस चीज़ पर ख़ातेमा कर जो अन्जाम के लेहाज़ से पसन्दीदा और मआल के एतबार से बेहतर हो। इसलिये के तू नफ़ीस व पाकीज़ा चीज़ें अता करता और बड़ी नेमतें बख़्शता है और जो चाहता है वही करता है और तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

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