Thursday, 20 September 2012

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 26th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.


छब्बीसवीं दुआ
जब हमसायों और दोस्तों को याद करते तो उनके लिये यह दुआ फ़रमाते

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी इस सिलसिले में बेहतर नुसरत फ़रमा के मैं अपने हमसायों और उन दोस्तों के हुक़ूक़ का लेहाज़ रखूं जो हमारे हक़ के पहचानने वाले और हमारे दुष्मनों के मुख़ालिफ़ हैं और उन्हें अपने तरीक़ों के क़ाएम करने और उमदा इख़लाक़ व आदाब से आरास्ता होने की तौफ़ीक़ दे इस तरह के वह कमज़ोरों के साथ नरम रवैया रखें और उनके फ़क्ऱ का मदावा करें, मरीज़ों की बीमार पुर्सी, तालिबाने हिदायत की हिदायत, मषविरा करने वालों की ख़ैर ख़्वाही और ताज़ा वारिद से मुलाक़ात करें। राज़ों को छिपाएं, ऐबों पर पर्दा डालें, मज़लूम की नुसरत और घरेलू ज़रूरियात के ज़रिये हुस्ने मवासात करें और बख़्शिश व इनआम से फ़ायदा पहुंचाएं और सवाल से पहले उनके ज़ुरूरियात मुहैया करें।

ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना के मैं उनमें से बुरे के साथ भलाई से पेष आऊं और ज़ालिम से चष्मपोषी करके दरगुज़र करूं और इन सबके बारे में हुस्ने ज़न से काम लूँ और नेकी व एहसान के साथ सबकी ख़बरगीरी करूं और परहेज़गारी व इफ़्फत की बिना पर उन (के उयूब) से आंखें बन्द रखूं। तवाज़ोह व फ़रवतनी की रू से उनसे नरम रवय्या इख़्तेयार करूं और षफ़क़्क़त की बिना पर मुसीबतज़दा की दिलजोई करूं। उनकी ग़ैबत में भी उनकी मोहब्बत को दिल में लिये रहूं और ख़ुलूस की बिना पर उनके पास सदा नेमतों का रहना पसन्द करूं और जो चीज़ें अपने ख़ास क़रीबियों के लिये ज़रूरी समझूं उनके लिये भी ज़रूरी समझूं, और जो मुराहात अपने मख़सूसीन से करूं वोही मुराहात उनसे भी करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे भी उनसे वैसे ही सुलूक का रवादार क़रार दे और जो चीज़ें उनके पास हैं उनमें मेरा हिस्सा वाफ़िर क़रार दे। और उन्हें मेरे हक़ की बसीरत और मेरे फ़ज़्ल व बरतरी की मारेफ़त में अफ़ज़ाइष व तरक़्क़ी दे ताके वह मेरी वजह से सआदतमन्द और मैं उनकी वजह से मसाब व माजूर क़रार पाऊं। आमीन ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

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