Thursday, 20 September 2012

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 45th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 पैंतालीसवीं दुआ  
दुआए विदाए माहे रमज़ान


ऐ अल्लाह! ऐ वह जो (अपने एहसानात) का बदला नहीं चाहता। ऐ वह जो अता व बख़्शिश पर पशेमान नहीं होता। ऐ वह जो अपने बन्दों को (उनके अमल के मुक़ाबले में) नपा तुला अज्र नहीं देता। तेरी नेमतें बग़ैर किसी साबेक़ा इस्तेहक़ाक़ के हैं और तेरा अफ़ो व दरगुज़र तफ़ज़्ज़ुल व एहसान है। तेरा सज़ा देना ऐने अद्ल और तेरा फ़ैसला ख़ैर व बहबूदी का हामिल है। तू अगर देता है तो अपनी अता को मन्नत गुज़ारी से आलूदा नहीं करता और अगर मना कर देता है तो यह ज़ुल्म व ज़्यादती की बिना पर नहीं होता। जो तेरा षुक्र अदा करता है तू उसके षुक्र की जज़ा देता है। हालांके तू ही ने उसके दिल में शुक्रगुज़ारी का अलक़ा किया है और जो तेरी हम्द करता है उसे बदला देता है। हालांके तू ही ने उसे हम्द की तालीम दी है और ऐसे शख़्स की पर्दापोशी करता है के अगर चाहता तो उसे रूसवा कर देता, और ऐसे शख़्स को देता है के अगर चाहता तो उसे न देता। हालांके वह दोनों तेरी बारगाहे अदालत में रूसवा व महरूम किये जाने ही के क़ाबिल थे मगर तूने अपने अफ़आल की बुनियाद व तफ़ज़्ज़ुल व एहसान पर रखी है और अपने इक़्तेदार को अफ़ो व दरगुज़र की राह पर लगाया है। और जिस किसी ने तेरी नाफ़रमानी की तूने उससे बुर्दबारी का रवैया इख़्तेयार किया। और जिस किसी ने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म का इरादा किया तूने उसे मोहलत दी, तू उनके रूजूअ होने तक अपने हिल्म की बिना पर मोहलत देता है और तौबा करने तक उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता ताके तेरी मन्शा के खि़लाफ़ तबाह होने वाला तबाह न हो और तेरी नेमत की वजह से बदबख़्त होने वाला बदबख़्त न हो मगर उस वक़्त के जब उस पर पूरी उज़्रदारी और एतमामे हुज्जत हो जाए। ऐ करीम! यह (एतमामे हुज्जत) तेरे अफ़ो व दरगुज़र का करम और ऐ बुर्दबार तेरी शफ़क़्क़त व मेहरबानी का फ़ैज़ है तू ही है वह जिसने अपने बन्दों के लिये अफ़ो व बख़्शिश का दरवाज़ा खोला है और उसका नाम तौबा रखा है और तूने इस दरवाज़े की निशानदेही के लिये अपनी वही को रहबर क़रार दिया है ताके वह उस दरवाज़े से भटक न जाएं। चुनांचे ऐ मुबारक नाम वाले तूने फ़रमाया है के ख़ुदा की बारगाह में सच्चे दिल से तौबा करो। उम्मीद है के तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे गुनाहों को महो कर दे और तुम्हें उस बेहिश्त में दाखि़ल करे जिसके (मोहल्लात व बाग़ात के) नीचे नहरें बहती हैं। उस दिन जब ख़ुदा अपने रसूल स0 और उन लोगों को जो उस पर ईमान लाए हैं रूसवा नहीं करेगा बल्कि उनका नूर उनके आगे आगे और उनकी दाई जानिब चलता होगा और वह लोग यह कहते होंगे के ऐ हमारे परवरदिगार! हमारे लिये हमारे नूर को कामिल फ़रमा और हमें बख़्श दें इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है। तो अब जो इस घर में दाखि़ल होने से ग़फ़लत करे जबके दरवाज़ा खोला और रहबर मुक़र्रर किया जा चुका है तो इसका उज्ऱ व बहाना क्या हो सकता है? तू वह है जिसने अपने बन्दों के लिये लेन देन में ऊंचे नरख़ों का ज़िम्मा ले लिया है और यह चाहा है के वह जो सौदा तुझसे करें उसमें उन्हें नफ़ा हो और तेरी तरफ़ बढ़ने और ज़्यादा हासिल करने में कामयाब हों। चुनांचे तूने के जो मुबारक नाम वाला और बलन्द मक़ाम वाला है। फ़रमाया है- ‘‘जो मेरे पास नेकी लेकर आएगा उसे उसका दस गुना अज्र मिलेगा और जो बुराई का मुरतकिब होगा तो उसको बुराई का बदला बस उतना ही मिलेगा जितनी बुराई है।’’ और तेरा इरशाद है के ‘‘जो लोग अल्लाह तआला की राह में अपना माल ख़र्च करते हैं उनकी मिसाल उस बीज की सी है जिससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ सौ दाने हों और ख़ुदा जिसके लिये चाहता है दुगना कर देता है’’ और तेरा इरशाद है के - कौन है जो अल्लाह तआला को क़र्ज़े हसना दे ताके ख़ुदा उसके माल को कई गुना ज़्यादा करके अदा करे’’ और ऐसी ही अफ़ज़ाइश इसनात के वादे पर मुश्तमिल दूसरी आयतें के जो तूने क़ुरान मजीद में नाज़िल की हैं और तू ही वह है जिसने वही व ग़ैब के कलाम और ऐसी तरग़ीब के ज़रिये के जो उनके फ़ायदे पर मुश्तमिल है ऐसे उमूर की तरफ़ उनकी रहनुमाई की के अगर उनसे पोशीदा रखता तो न उनकी आंखें देख सकतीं न उनके कान सुन सकते और न उनके तसव्वुरात वहां तक पहुंच सकते। चुनांचे तेरा इरशाद है के तुम मुझे याद रखो मैं भी तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं होंगा और मेरा शुक्र अदा करते रहो और नाशुक्री न करो। और तेरा इरशाद है के ‘‘अगर नाशुक्री की तो याद रखो के मेरा अज़ाब सख़्त अज़ाब है’’ और तेरा इरशाद है के ‘‘मुझसे दुआ मांगो तो मैं क़ुबूल करूंगा, वह लोग जो ग़ुरूर की बिना पर मेरी इबादत से मुंह मोड़ लेते हैं वह अनक़रीब ज़लील होकर जहन्नुम में दाखि़ल होंगे।’’ चुनांचे तूने दुआ का नाम इबादत रखा और उसके तर्क को ग़ुरूर से ताबीर किया और उसके तर्क पर जहन्नुम में ज़लील होकर दाखि़ल होने से डराया। इसलिये उन्होंने तेरी नेमतों की वजह से तुझे याद किया। तेरे फ़ज़्ल व करम की बिना पर तेरा शुक्रिया अदा किया और तेरे हुक्म से तुझे पुकारा और (नेमतों में) तलबे अफ़ज़ाइश के लिये तेरी राह में सदक़ा दिया और तेरी यह रहनुमाई ही उनके लिये तेरे ग़ज़ब से बचाव और तेरी ख़ुशनूदी तक रसाई की सूरत थी। और जिन बातों की तूने अपनी जानिब से अपने बन्दों की राहनुमाई की है अगर कोई मख़लूक़ अपनी तरफ़ से दूसरे मख़लूक़ की ऐसी ही चीज़ों की तरफ़ राहनुमाई करता तो वह क़ाबिले वहसील होता। तो फिर तेरे ही लिये हम्द व सताइश  है। जब तक तेरी हम्द के लिये राह पैदा होती रहे और जब तक हम्द के वह अल्फ़ाज़ जिनसे तेरी तहमीद की जा सके और हम्द के वह मानी जो तेरी हम्द की तरफ़ पलट सकें बाक़ी रहें। ऐ वह जो अपने फ़ज़्ल व एहसान से बन्दों की हम्द का सज़ावार हुआ है और उन्हें अपनी नेमत व बख़्शिश से ढांप लिया है। हम पर तेरी नेमतें कितनी आशकारा हैं और तेरा इनआम कितना फ़रावां है और किस क़द्र हम तेरे इनआम व एहसान से मख़सूस हैं। तूने उस दीन की जिसे मुन्तखि़ब फ़रमाया और उस तरीक़े की जिसे पसन्द फ़रमाया और उस रास्ते की जिसे आसान कर दिया हमें हिदायत की और अपने हां क़रीब हासिल करने और इज़्ज़त व बुज़ुर्गी तक पहुंचने के लिये बसीरत दी। बारे इलाहा! तूने इन मुन्तख़ब फ़राएज़ और मख़सूस वाजेबात में से माहे रमज़ान को क़रार दिया है। जिसे तूने तमाम महीनों में इम्तियाज़ बख़्श और तमाम वक़्तों और ज़बानों में उसे मुन्तख़ब फ़रमाया है। और इसमें क़ुरान और नूर को नाज़िल फ़रमाकर और ईमान को फ़रोग़ व तरक़्क़ी बख़्श कर उसे साल के तमाम औक़ात पर फ़ज़ीलत दी और इसमें रोज़े वाजिब किये और नमाज़ों की तरग़ीब दी और उसमें शबे क़द्र को बुज़ुर्गी बख़्शी जो ख़ुद हज़ार महीनों से बेहतर है। फिर इस महीने की वजह से तूने हमें तमाम उम्मतों पर तरजीह दी, और दूसरी उम्मतों के बजाए हमें इसकी फ़ज़ीलत के बाएस मुन्तख़ब किया। चुनान्चे हमने तेरे हुक्म से इसके दिनों में रोज़े रखे और तेरी मदद से इसकी रातें इबादत में बसर कीं। इस हालत में के हम इस रोज़ा नमाज़ के ज़रिये तेरी उस रहमत के ख़्वास्तगार थे जिसका दामन तूने हमारे लिये फैलाया है और उसे तेरे अज्र व सवाब का वसीला क़रार दिया और तू हर उस चीज़ के अता करने पर क़ादिर है जिसकी तुझसे ख़्वाहिश की जाए और हर उस चीज़ का बख़्शने वाला है जिसका तेरे फ़ज़्ल से सवाल किया जाए तू हर उस शख़्स से क़रीब है जो तुझसे क़ुर्ब हासिल करना चाहे। इस महीने ने हमारे दरम्यान क़ाबिले सताइश दिन गुज़ारे और अच्छी तरह हक़्क़े रफ़ाक़त अदा किया और दुनिया जहान के बेहतरीन फ़ायदों से हमें मालामाल किया फिर जब उसका ज़माना ख़त्म हो गया मुद्दत बीत गई और गिनती तमाम हो गई तो वह हमसे जुदा हो गया। अब हम उसे रूख़सत करते हैं उस शख़्स के रूख़सत करने की तरह जिसकी जुदाई हम पर शाक़ हो और जिसका जाना हमारे लिये ग़मअफ़ज़ा और वहशतअंगेज़ हुआ और जिसके अहद व पैमान की निगेहदाश्त इज़्ज़त व हुरमत का पास और उसके वाजिबुल अदा हक़ से सुबुकदोशी अज़ बस ज़रूरी हो। इसलिये हम कहते हैं ऐ अल्लाह के बुज़ुर्गतरीन महीने, तुझ पर सलाम। ऐ दोस्ताने ख़ुदा की ईद तुझ पर सलाम। ऐ औक़ात में बेहतरीन रफ़ीक़ और दिनों और साअतों में बेहतरीन महीने तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जिसमें उम्मीद बर आती हैं और आमाल की फ़रावानी होती है, तुझ पर सलाम, ऐ वह हम नशीन के जो मौजूद हो तो उसकी बड़ी क़द्र व मन्ज़िलत होती है और न होने पर बड़ा दुख होता है और ऐ वह सरश्माए उम्मीद दरजा जिसकी जुदाई  अलम अंगेज़ है, तुझ पर सलाम। ऐ वह हमदम जो उन्स व दिलबस्तगी का सामान लिये हुए आया तो शादमानी का सबब हुआ और वापस गया तो वहशत बढ़ाकर ग़मगीन बना गया। तुझ पर सलाम। ऐ वह हमसाये जिसकी हमसायगी में दिल नर्म और गुनाह कम हो गए, तुझ पर सलाम। ऐ वह मददगार जिसने शैतान के मुक़ाबले में मदद व एआनत की, ऐ वह साथी जिसने हुस्ने अमल की राहें हमवार कीं तुझ पर सलाम। (ऐ माहे रमज़ान) तुझमें अल्लाह तआला के आज़ाद किये हुए बन्दे किस क़द्र ज़्यादा हैं और जिन्होंने तेरी हुरमत व इज़्ज़त का पास व लेहाज़ रखा वह कितने ख़ुश नसीब हैं, तुझ पर सलाम, तू किस क़द्र गुनाहों को महो करने वाला और क़िस्म क़िस्म के ऐबों को छिपाने वाला है। तुझ पर सलाम। तू गुनहगारों के लिये कितना तवील और मोमिनों के दिलों में कितना पुर हैबत है। तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जिससे दूसरे अय्याम हमसरी का दावा नहीं कर सकते, तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जो हर अम्र से सलामती का बाएस है तुझ पर सलाम। ऐ वह जिसकी हम नशीनी बारे ख़ातिर और मआशेरत नागवार नहीं, तुझ पर सलाम जबके तू बरकतों के साथ हमारे पास आया और गुनाहों की आलूदगियों को धो दिया, तुझ पर सलाम। ऐ वह जिसे दिल तंगी की वजह से रूख़सत नहीं किया गया और न ख़स्तगी की वजह से उसके रोज़े छोड़े गये तुझ पर सलाम। ऐ व हके जिसके आने की पहले से ख़्वाहिश थी और जिसके ख़त्म होने से क़ब्ल ही दिल रंजीदा हैं तुझ पर सलाम। तेरी वजह से कितनी बुराईयां हमसे दूर हो गईं और कितनी भलाइयों के सरचश्मे हमारे लिये जारी हो गये। तुझ पर सलाम (ऐ माहे रमज़ान)  तुझ पर और उस शबे क़द्र पर जो हज़ार महीनों से बेहतर है। सलाम हो, अभी कल हम कितने तुझ पर वारफ़ता थे और आने वाले कल में हमारे शौक़ की कितनी फ़रावानी होगी। तुझ पर सलाम। (ऐ माहे मुबारक तुझ पर) और तेरी उन फ़ज़ीलतों पर जिनसे हम महरूम हो गए और तेरी गुज़िश्ता बरकतों पर जो हमारे हाथ से जाती रहीं। सलाम हो ऐ अल्लाह हम उस महीने से मख़सूस हैं जिसकी वजह से तूने हमें शरफ़ बख़्शा और अपने लुत्फ़ व एहसान से इसकी हक़शिनासी की तौफ़ीक़ दी जबके बदनसीब लोग इसके वक़्त की (क़द्र व क़ीमत) से बेख़बर थे और अपनी बदबख़्ती की वजह से इसके फ़ज़्ल से महरूम रह गए। और तू ही वली व साहेबे इख़्तेयार है। के हमें इसकी हक़शिनासी के लिये मुन्तख़ब किया और इसके एहकाम की हिदायत फ़रमाई। बेशक तेरी तौफ़ीक़ से हमने इस माह में रोज़े रखे, इबादत के लिये क़याम किया मगर कमी व कोताही के साथ और मुश्ते अज़ ख़रवार से ज़्यादा न बजा ला सके। ऐ अल्लाह! हम अपनी बदआमाली का इक़रार और सहलअंगारी का एतराफ़ करते हुए तेरी हम्द करते हैं और अब तेरे लिये कुछ है तो वह हमारे दिलों की वाक़ेई शर्मसारी और हमारी ज़बानों की सच्ची माज़ेरत है, लेहाज़ा इस कमी व कोताही के बावजूद जो हमसे हमसे हुई है हमें ऐसा अज्र अता कर के हम उसके ज़रिये दिलख़्वाह फ़ज़ीलत व सआदत को पा सकें और तरह तरह के अज्र व सवाब के ज़ख़ीरे जिसके हम आरज़ूमन्द थे उसके एवज़ हासिल कर सकें। और हम ने तेरे हक़ में जो कमी व कोताही की है उसमें हमारे उज्ऱ को क़ुबूल फ़रमा और हमारी उम्रे आईन्दा का रिश्ता आने वाले माहे रमज़ान से जोड़ दे। और जब उस तक पहुंचा दे तो जो इबादत तेरे शायाने शान हो उसके बजा लाने पर हमारी एआनत फ़रमाना और इस इताअत पर जिसका वह महीना सज़ावार है अमल पैरा होने तौफ़ीक़ देना और हमारे लिये ऐसे नेक आमाल का सिलसिला जारी रखना के जो ज़मानाए ज़ीस्त के महीनों में एक के बाद दूसरे माह माहे रमज़ान में तेरे हक़ अदायगी का बाएस हों।
 
ऐ अल्लाह! हमने इस महीने में जो सग़ीरा या कबीरा मासीयत की हो, या किसी गुनाह से आलूदा और किसी ख़ता के मुरतकिब हुए हों जान बूझकर या भूले चौके, ख़ुद अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया हो या दूसरे का दामने हुरमत चाक किया हो। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपने पर्दे में ढांप ले, और अपने अफ़ो व दरगुज़र से काम लेते हुए मुआफ़ कर दे। और ऐसा न हो के इस गुनाह की वजह से तन्ज़ करने वालों की आंखें हमें घूरें और तानाज़नी करने वालों की ज़बानें हम पर खुलें। और अपनी शफ़क़्क़ते बेपायां और मरहमत रोज़अफ़ज़ों से हमें इन आमाल पर कारबन्द कर के जो उन चीज़ों को बरतरफ़ करें और उन बातों की तलाफ़ी करें जिन्हें तु इस माह में हमारे लिये नापसन्द करता है।
 
ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस महीने के रूख़सत होने से जो क़लक़ हमें हुआ है उसका चारा कर और ईद और रोज़ा छोड़ने के दिल हमारे लिये मुबारक क़रार दे और उसे हमारे गुज़रे हुए दिनों में बेहतरीन दिन क़रार दे जो अफ़ो व दरगुज़र को समेटने वाला और गुनाहों को महो करने वाला हो और तू हमारे ज़ाहिर व पोशीदा गुनाहों को बख़्श दे। बारे इलाहा! इस महीने के अलग होने के साथ तू हमें गुनाहों से अलग कर दे और इसके निकलने के साथ तू हमें बुराइयों से निकाल ले। और इस महीने की बदौलत उसको आबाद करने वालों में हमें सबसे बढ़कर ख़ुश बख़्त बानसीब और बहरामन्द क़रार दे। ऐ अल्लाह! जिस किसी ने जैसा चाहिये इस महीने का पास व लेहाज़ किया हो और कमा हक़्क़हू इसका एहतेराम मलहूज़ रखा हो और इसके एहकाम पर पूरी तरह अमलपैरा रहा हो। और गुनाहों से जिस तरह बचना चाहिये उस तरह बचा हो या ब नीयते तक़रूब ऐसा अमले ख़ैर बजा लाया हो जिसने तेरी ख़ुशनूदी उसके लिये ज़रूरी क़रार दी हो और तेरी रहमत को उसकी तरफ़ मुतवज्जेह कर दिया हो तो जो उसे बख़्शे वैसा ही हमें भी अपनी दौलते बेपायां में से बख़्श और अपने फ़ज़्ल व करम से इससे भी कई गुना ज़ाएद अता कर। इस लिये के तेरे फ़ज़्ल के सोते ख़ुश्क नहीं होते और तेरे ख़ज़ाने कम होने में नहीं आते बल्कि बढ़ते ही जाते हैं। और न तेरे एहसानात की कानें फ़ना होती है और तेरी बख़्शिश व अता तो हर लेहाज़ से ख़ुशगवारबख़्शिश व अता है।
 
ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जो लोग रोज़े क़यामत तक इस माह के रोज़े रखें या तेरी इबादत करें उनके अज्र व सवाब के मानिन्द हमारे लिये अज्र व सवाब सब्त फ़रमा। ऐ अल्लाह! हम उस रोज़े फ़ित्र में जिसे तूने अहले ईमान के लिये ईद व मसर्रत का रोज़ और अहले इस्लाम के लिये इज्तेमाअ व तआवुन का दिन क़रार दिया है हर उस गुनाह से जिसके हम मुरतकिब हुए हों और हर उस बुराई से जिसे पहले कर चुके हों और हर बुरी नीयत से जिसे दिल में लिये हुए हों उस शख़्स की तरह तौबा करते हैं जो गुनाहों की तरफ़ दोबारा पलटने का इरादा न रखता हो और न तौबा के बाद ख़ता का मुरतकिब होता हो। ऐसी सच्ची तौबा जो हर शक व शुबह से पाक हो। तो अब हमारी तौबा को क़ुबूल फ़रमा हमसे राज़ी व ख़ुशनूद हो जा और हमें इस पर साबित क़दम रख। ऐ अल्लाह! गुनाहों की सज़ा का ख़ौफ़ और जिस सवाब का तूने वादा किया है उसका शौक़ हमें नसीब फ़रमा ताके जिस सवाब के तुझसे ख़्वाहिशमन्द हैं उसकी लज़्ज़त और जिस अज़ाब से पनाह मांग रहे हैं उसकी तकलीफ़ व अज़ीयत पूरी तरह जान सकें। और हमें अपने नज़दीक उन तौबा गुज़ारों में से क़रार दे जिनके लिये तूने अपनी मोहब्बत को लाज़िम कर दिया है और जिनसे फ़रमाबरदारी व इताअत की तरफ़ रूजू होने को तूने क़ुबूल फ़रमाया है। ऐ अद्ल करने वालों में सबसे ज़्यादा अद्ल करने वाले।
 
ऐ अल्लाह! हमारे मां बाप और हमारे तमाम अहले मज़हब व मिल्लत ख़्वाह वह गुज़र चुके हों या क़यामत के दिन तक आईन्दा आने वाले हों सबसे दरगुज़र फ़रमा। ऐ अल्लाह! हमारे नबी मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी रहमत तूने अपने मुक़र्रब फ़रिश्तों पर की है। और उन पर उनकी आल पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी तूने अपने फ़रस्तादा नबीयों पर नाज़िल फ़रमाई है। और उन पर और उनकी आल(अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी तूने अपने नेकोकार बन्दों पर नाज़िल की है। (बल्कि) इससे बेहतर व बरतर। ऐ तमाम जहान के परवरदिगार ऐसी रहमत जिसकी बरकत हम तक पहुंचे, जिसकी मनफ़अत हमें हासिल हो और जिसकी वजह से हमारी दुआएं क़ुबूल हों। इसलिये के तू उन लोगों से जिनकी तरफ़ रूजू हुआ जाता है, ज़्यादा करीम और उन लोगों से जिन पर भरोसा किया जाता है, ज़्यादा बेनियाज़ करने वाला है और उन लोगों से जिनके फ़ज़्ल की बिना पर सवाल किया जाता है, ज़्यादा अता करने वाला है और तू हर चीज़ पर क़ादिर व तवाना है।

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चौवालीसवीं दुआ
दुआए इस्तेक़बाले माहे रमज़ान


तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने अपनी हम्द व सेपास की तरफ़ हमारी रहनुमाई की और हमें हम्दगुज़ारों में से क़रार दिया ताके हम उसके एहसानात पर शुक्र करने वालों में महसूब हों और हमें इस शुक्र के बदले में नेकोकारों का अज्र दे। उस अल्लाह तआला के लिये हम्द व सताइश है जिसने हमें अपना दीन अता किया और अपनी मिल्लत में से क़रार देकर इम्तियाज़ बख़्शा और अपने लुत्फ़ व एहसान की राहों पर चलाया। ताके हम उसके फ़ज़्ल व करम से उन रास्तों पर चल कर उसकी ख़ुशनूदी तक पहुंचें। ऐसी हम्द जिसे वह क़ुबूल फ़रमाए और जिसकी वजह से हम से वह राज़ी हो जाएं। तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये है जिसने अपने लुत्फ़ व एहसान के रास्तों में से एक रास्ता अपने महीने को क़रार दिया। यानी रमज़ान का महीना, सेयाम का महीना, इस्लाम का महीना, पाकीज़गी का महीना, तसफ़ीह और ततहीर का महीना, इबादत व क़याम का महीना, वह महीना जिसमें क़ुरान नाज़िल हुआ। जो लोगों के लिये रहनुमा है। हिदायत और हक़ व बातिल के इम्तियाज़ की रौशन सदाक़तें रखता है। चुनांचे तमाम महीनों पर इसकी फ़ज़ीलत व बरतरी को आशकारा किया। इन फ़रावां इज़्ज़तों और नुमायां फ़ज़ीलतों की वजह से जो इसके लिये क़रार दीं। और इसकी अज़मत के इज़हार के लिये जो चीज़ें दूसरे महीनों में जाएज़ की थें इसमें हराम कर दीें और इसके एहतेराम के पेशे नज़र खाने-पीने की चीज़ों से मना कर दिया और एक वाज़ेअ ज़माना इसके लिये मुअय्यन कर दिया। ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर यह इजाज़त नहीं देता के इसे उसके मुअय्यना वक़्त से आगे बढ़ाया जाए और न क़ुबूल करता है के इससे मोहर कर दिया जाए। फिर यह के इसकी रातों में से एक रात को हज़ार महीनों की रातों नी फज़ीलत दी और इसका नाम शबे क़द्र रखा। इस रात में फ़रिश्ते और रूह अलक़ुद्स हर उस अम्र के साथ जो उसका क़तई फ़ैसला होता है। इसके बन्दों में से जिसपर वह चाहता है नाज़िल होते हैं। वोह रात सरासर सलामती की रात है जिसकी बरकते तुलूए फ़ज्र तक दाएम व बरक़रार है। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें हिदायत फ़रमा के हम इस महीने के फ़ज़्ल व शरफ़ को पहचानें, इसकी इज़्ज़त व हुरमत को बलन्द जानें और इसमें इन चीज़ों से जिनसे तूने मना किया है इज्तेनाब करें और इसके रोज़े रखने में हमारे आज़ा को नाफ़रमानियों से रोकने और कामों में मसरूफ रखने से जो तेरी ख़ुशनूदी का बाएस हों हमारी एआनत फ़रमा, ताके हम न बेहूदा बातों की तरफ़ कान लगाएं न फ़िज़ूल ख़र्ची की तरफ़ बे महाबा निगाहें उठाएं, न हराम की तरफ़ हाथ बढ़ाएं न अम्रे ममनूअ की तरफ़ पेश क़दमी करें न तेरी हलाल की हुई चीज़ों के अलावा किसी चीज़ को हमारे शिकम क़ुबूल करें और न तेरी बयान की हुई बातों के सिवा हमारी ज़बानें गोया हों। सिर्फ़ उन चीज़ों के बजा लाने का बार उठाएं जो तेरे सवाब से क़रीब करें और सिर्फ़ उन कामों को अन्जाम दें जो तेरे अज़ाब से बचा ले जाएं फिर उन तमाम आमाल को रियाकारों की रियाकारी और शोहरत पसन्दों की शोहरत पसन्दी से पाक कर दे इस तरह के तेरे अलावा किसी को इनमें शरीक न करें और तेरे सिवा किसी से कोई मतलब न रखें। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें इसमें नमाज़हाए पन्जगाना के औक़ात से इन हुदूद के साथ जो तूने मुअय्यन किये हैं और उन वाजेबात के साथ जो तूने क़रार दिये हैं और उन लम्हात के साथ जो तूने मुक़र्रर किये हैं आगाह फ़रमा और हमें उन नमाज़ों में उन लोगों के मरतबे पर फ़ाएज़ कर जो इन नमाज़ों के दरजाते आलिया हासिल करने वाले, इनके वाजेबात की निगेहदाश्त करने वाले और उन्हें इनके औक़ात में इसी तरीक़े पर जो तेरे अब्दे ख़ास और रसूल सल्लल्लाहो अलैह वालेही वसल्लम ने रूकूअ व सुजूद और उनके तमाम फ़ज़ीलत व बरतरी के पहलुओं में जारी किया था, कामिल और पूरी पाकीज़गी और नुमायां व मुकम्मल ख़ुशू व फ़रवतनी के साथ अदा करने वाले हैं। और हमें इस महीने में तौफ़ीक़ दे के नेकी व एहसान के ज़रिये अज़ीज़ों के साथ सिलाए रहमी और इनआम व बख़्शिश से हमसायों की ख़बरगीरी करें और अपने अमवाल को मज़लूमों से पाक व साफ़ करें और ज़कात देकर उन्हें पाकीज़ा तय्यब बना लें और यह के जो हमसे अलाहेदगी इख़्तियार करे उसकी तरफ़ दस्ते मसालेहत बढ़ाएं, जो हम पर ज़ुल्म करे उस से इन्साफ़ बरतें जो हमसे दुश्मनी करे उससे सुलह व सफ़ाई करें सिवाए उसके जिससे तेरे लिये और तेरी ख़ातिर दुश्मनी की गयी हो। क्योंके वह ऐसा दुश्मन है जिसे हम दोस्त नहीं रख सकते और ऐसे गिरोह का (फ़र्द) है जिससे हम साफ़ नहीं हो सकते। और हमें इस महीने में ऐसे पाक व पाकीज़ा आमाल के वसीले से तक़र्रूब हासिल करने की तौफ़ीक़ दे जिनके ज़रिये तू हमें गुनाहों से पाक कर दे और अज़ सरे नौ बुराइयों के इरतेकाब से बचा ले जाए। यहां तक के फ़रिश्ते तेरे तेरी बारगाह में जो आमाल नामे पेश करें वह हमारी हर क़िस्म की इताअतों और हर नौअ की इबादत के मुक़ाबले में सुबुक हों। ऐ अल्लाह मैं तुझसे इस महीने के हक़ व हुरमत और नीज़ उन लोगों का वास्ता देकर सवाल करता हूं जिन्होंने इस महीने में शुरू से लेकर इसके ख़त्म होने तक तेरी इबादत की हो वह मुक़र्रब बारगाह फ़रिश्ता हो या नबी मुरसल  या कोई मर्द सालेह व बरगुज़ीदा के तू  मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाए और जिस इज़्ज़त व करामत का तूने अपने दोस्तों से वादा किया है उसका हमें अहल बना और जो इन्तेहाई इताअत करने वालों के लिये तूने अज्र मुक़र्रर किया है वह हमारे लिये मुक़र्रर फ़रमा और हमें अपनी रहमत से उन लोगों में शामिल कर जिन्होंने बलन्दतरीन मर्तबे का इस्तेहक़ाक़ पैदा किया। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें इस चीज़ से बचाए रख के हम तौहीद में कज अन्देशी तेरी तमजीद व बुज़ुर्गी में कोताही, तेरे दीन में शक, तेरे रास्ते से बे राहरवी और तेरी हुरमत से लापरवाही करें और तेरे दुश्मन शैतान मरदूद से फ़रेबख़ोर्दगी का शिकार हों। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब के इस महीने की रातों में हर रात में तेरे कुछ ऐसे बन्दे होते हैं जिन्हें तेरा अफ़ो व करम आज़ाद करता है या तेरी बख़्शिश व दरगुज़र उन्हें बख़्श देती है। तू हमें भी उन्हीं बन्दों में दाखि़ल कर और इस महीने के बेहतरीन एहल व असहाब में क़रार दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस चान्द के घटने के साथ हमारे गुनाहों को भी महो कर दे और जब इसके दिन ख़त्म होने पर आएं तो हमारे गुनाहों का वबाल हमसे दूर कर दे ताके यह महीना इस तरह तमाम हो के तू हमें ख़ताओं से पाक और गुनाहों से बरी कर चुका हो। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस महीने में अगर हम हक़ से मुंह मोड़े ंतो हमें सीधा रास्ते पर लगा दे और कजरवी इख़्तियार करें तो हमारी इस्लाह व दुरूस्तगी फ़रमा और अगर तेरा दुश्मन शैतान हमारे गिर्द एहाता करे तो उसके पन्जे से छुड़ा ले। बारे इलाहा! इस महीने का दामन हमारी इबादतों से जो तेरे लिये बजा लाई गई हों, भर दे और इसके लम्हात को हमारी इताअतों से सजा दे और इसके दिनों में रोज़े रखने और इसकी रातों में नमाज़ें पढ़ने, तेरे हुज़ूर गिड़गिड़ाने तेरे सामने अज्ज़ व इलहाह करने और तेरे रू बरू ज़िल्लत व ख़्वारी का मुज़ाहेरा करने, इन सबमें हमारी मदद फ़रमा। ताके इसके दिन हमारे खि़लाफ़ ग़फ़लत की और इसकी रातें कोताही व तक़स्बर की गवाही न दें। ऐ अल्लाह! तमाम महीनों और दिनों में जब तक तू हमें ज़िन्दा रखे, ऐसा ही क़रार दे। और हमें उन बन्दों में शामिल फ़रमा जो फ़िरदौसे बरीं की ज़िन्दगी के हमेशा हमेशा के लिये वारिस होंगे। और व हके जो कुछ वह ख़ुदा की राह में दे सकते हैं, देते हैं। फिर भी उनके दिलों को यह खटका लगा रहता है के उन्हें अपने परवरदिगार की तरफ़ पलट कर जाना है। और उन लोगों में से जो नेकियों में जल्दी करते हैं और वोही तो वह लोग हैं जो भलाइयों में आगे निकल जाने वाले हैं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर हर वक़्त और हर घड़ी और हर हाल में इस क़द्र रहमत नाज़िल फ़रमा जितनी तूने किसी पर नाज़िल की हो और उन सब रहमतों से दोगुनी चौगनी के जिसे तेरे अलावा कोई शुमार न कर सके। बेशक तू जो चाहता है वही करने वाला है। 

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तेंतालीसवीं दुआ
दुआए रोयते हेलाल


ऐ फ़रमाबरदार, सरगर्मे अमल और तेज़ रौ मख़लूक़ और मुक़रर्रा मन्ज़िलों में यके बाद दीगरे वारिद होने और फ़लक नज़्म व तदबीरें तसरूफ़ करने वाले मैं उस ज़ात पर ईमान लाया जिसने तेरे ज़रिये तारीकियों को रौषन और ढकी छिपी चीज़ों को आशकार किया और तुझे अपनी शाही व फ़रमानरवाई की निशानियों में से एक निशानी और अपने ग़लबे व इक़्तेदार की अलामतों में से एक अलामत क़रार दिया और तुझे बढ़ने, घटने, निकलने, छिपने और चमकने गहनाने से तसख़ीर किया। इन तमाम हालात में तू उसके ज़ेरे फ़रमान और उसके इरादे की जानिब रवां दवां है। तेरे बारे में उसकी तदबीर व कारसाज़ी कितनी अजीब और तेरी निस्बत उसकी सनाई कितनी लतीफ़ है, तुझे पेश आईन्द हालात के लिये नये महीने की कलीद क़रार दिया। तो अब मैं अल्लाह तआला से जो मेरा परवरदिगार, मेरा ख़ालिक़ और तेरा ख़ालिक़ मेरा नक़्श आरा और तेरा नक़्श आरा और मेरा सूरतगर और तेरा सूरत गर है सवाल करता हूं के वह रहमत नाज़िल करे मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और तुझे ऐसी बरकत वाला चान्द क़रार दे, जिसे दिनों की गर्दिशें ज़ाएल न कर सकें और ऐसी पाकीज़गी वाला जिसे गुनाह की कशाफ़तें आलूदा न कर सकें। ऐसा चान्द जो आफ़तों से बरी और बुराइयों से महफ़ूज़ हो। सरासर यमन व सआदत का चान्द जिस में ज़रा नहूसत न हो और सरापा ख़ैर व बरकत का चान्द जिसे तंगी व उसरत से कोई लगाव न हो और ऐसी आसानी व कशाइश का जिस में दुश्वारी की आमेज़िश न हो और ऐसी भलाई का जिसमें बुराई का शाएबा न हो। ग़रज़ सर ता पा अम्न, ईमान, नेमत, हुस्ने अमल, सलामती और इताअत व फ़रमा बरदारी का चान्द हो, ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जिन जिन पर यह अपना परतो डालें उनसे बढ़कर हमें ख़ुशनूद और जो जो उसे देखे उन सबसे ज़्यादा दुरूस्तकार और जो जो जो इस महीने में तेरी इबादत करे उन सबसे ज़्यादा ख़ुशनसीब क़रार दे। और हमें इसमें तौबा की तौफ़ीक़ दे और गुनाहों से दूर और मासियत के इरतेकाब से महफ़ूज़ रखे और हमारे दिल में अपनी नेमतों पर अदाए शुक्र का वलवला पैदा कर और हमें अम्न व आफ़ियत की सिपर में ढांप ले और इस तरह हम पर अपनी नेमत को तमाम करके तेरी फ़राएज़े इताअत को पूरे तौर से अन्जाम दें। बेशक तू नेमतों का बख़्शने वाला और क़ाबिले सताइश है। रहमते फ़रावां नाज़िल करे अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर।

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बयालीसवीं दुआ
दुआए ख़त्मुल क़ुरान


बारे इलाहा! तूने अपनी किताब के ख़त्म करने पर मेरी मदद फ़रमाई। वह किताब जिसे तूने नूर बनाकर उतारा और तमाम किताबे समाविया पर उसे गवाह बनाया और हर उस कलाम पर जिसे तूने बयान फ़रमाया उसे फ़ौक़ीयत बख़्शी और (हक़ व बातिल में) हद्दे फ़ासिल क़रार दिया जिसके ज़रिये हलाल व हराम अलग-अलग कर दिया। वह क़ुरान जिसके ज़रिये शरीयत के एहकाम वाज़ेह किये वह किताब जिसे तूने अपने बन्दों के लिये शरह व तफ़सील से बयान किया और वह वही (आसमानी) जिसे अपने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे वालेहीवसल्लम पर नाज़िल फ़रमाया जिसे वह नूर बनाया जिसकी पैरवी से हम गुमराही व जेहालत की तारीकियों हिदायत हासिल करते हैं और उस शख़्स के लिये शिफ़ा क़रार दिया जो उस पर एतबार रखते हुए उसे समझना चाहते हैं और ख़ामोशी के साथ उसे सुने और वह अद्ल व इन्साफ़ का तराज़ू बनाया जिसका कांटा हक़ से इधर-उधर नहीं होता और वह नूरे हिदायत क़रार दिया जिसकी दलील व बुरहान की रोषनी (तौहीद व नबूवत की) गवाही देने वालों के लिये बुझती नहीं और वह निजात का निशान बनाया के जो उसके सीधे तरीक़े पर चलने का इरादा करे वह गुमराह नहीं होता और जो उसकी दीसमान के बन्धन से वाबस्ता हो वह (ख़ौफ़ व फ़क्र व अज़ाब की) हलाकतों की दस्तरसी से बाहर हो जाता है। बारे इलाहा! जबके तूने उसकी तिलावत के सिलसिले में हमें मदद पहुंचाई और उसके हुस्ने अदायगी के लिये हमारी ज़बान की गिरहें खोल दीं तो फिर हमें उन लोगों में से क़रार दे जो उसकी पूरी तरह हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त करते हों और उसकी मोहकम आयतों के एतराफ़ व तस्लीम की पुख़्तगी के साथ तेरी इताअत करते हों और मुतशाबेह आयतों और रोशन व वाज़ेह दलीलों के इक़रार के साये में पनाह लेते हों।

ऐ अल्लाह! तूने उसे अपने पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वआलेही वसल्लम पर इजमाल के तौर पर उतारा और उसके अजाएब व इसरार का पूरा-पूरा आलम उन्हें अलक़ा किया और उसके इल्मे तफ़सीली का हमें वारिस क़रार दिया, और जो इसका इल्म नहीं रखते उन पर हमें फ़ज़ीलत दी। और उसके मुक़तज़ीयात पर अमल करने की क़ूवत बख़्शी ताके जो उसके हक़ाएक़ के मुतहम्मिल नहीं हो सकते उन पर हमारी फ़ौक़ीयत व बरतरी साबित कर दे।

ऐ अल्लाह! जिस तरह तूने हमारे दिलों को क़ुरान का हामिल बनाया और अपनी रहमत से उसके फ़ज़्ल व शरफ़ से आगाह किया यूँ ही मोहम्मद (स0) पर जो क़ुरान के ख़ुत्बा ख़्वाँ, और उनकी आल (अ0) पर जो क़ुरान के ख़ज़ीनेदार हैं रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो यह इक़रार करते हैं के यह तेरी जानिब से है ताके इसकी तस्दीक़ में हमें शक व शुबह लाहक़ न हो और उसके सीधे रास्ते से रूगर्दानी का ख़याल भी न आने पाए। 
ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो उसकी रीसमान से वाबस्ता उमूर में उसकी मोहकम पनाहगाह का सहारा लेते और उसके परों के ज़ेरे साया मन्ज़िल करते, इसकी सुबह दरख़्शां की रोशनी से हिदायत पाते और उसके नूर की दरख़्शन्दगी पैरवी करते और उसके चिराग़ से चिराग़ जलाते हैं और उसके अलावा किसी से हिदायत के तालिब नहीं होते।

बारे इलाहा! जिस तरह तूने इस क़ुरान के ज़रिये मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वआलेही वसल्लम को अपनी रहनुमाई का निशान बनाया है और उनकी आल (अ0) के ज़रिये अपनी रज़ा व ख़ुशनूदी की राहें आशकार की हैं यूंही मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे लिये क़ुरान को इज़्ज़त व बुज़ुर्गी की बलन्दपाया मन्ज़िलों तक पहुंचने का वसीला और सलामती के मक़ाम तक बलन्द होने का ज़ीना और मैदाने हश्र में निजात को जज़ा में पाने का सबब और महल्ले क़याम (जन्नत) की नेमतों तक पहुंचने का ज़रिया क़रार दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये गुनाहों का भारी बोझ हमारे सर से उतार दे और नेकोकारों के अच्छे ख़साएल व आदात हमें मरहमत फ़रमा और उन लोगों के नक़्शे क़दम पर चला जो तेरे लिये रात के लम्हों और सुबह व शाम (की साअतों) में उसे अपना दस्तूरूल अमल बनाते हैं ताके उसकी ततहीर के वसीले से तू हमें हर आलूदगी से पाक कर दे और इन लोगों के नक़्शे क़दम पर चलाए, जिन्होंने उसके नूर से रोशनी हासिल की है। और उम्मीदों ने उन्हें अमल से ग़ाफ़िल नहीं होने दिया के उन्हें अपने क़रीब की नैरंगियों से तबाह कर दें।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान को रात की तारीकियों में हमारा मोनिस और शैतान के मफ़सनदों और दिल में गुज़रने वाले वसवसों से निगेहबानी करने और हमारे क़दमों को नाफ़रमानियों की तरफ़ बढ़ने से रोक देने वाला और हमारी ज़बानों को बातिल पैमाइयों से बग़ैर किसी मर्ज़ के गंग कर देने वाला और हमारे आज़ा को इरतेकाब गुनाह से बाज़ रखने वाला और हमारी ग़फ़लत व मदहोशी ने जिस दफ़्तरे इबरत व पन्द अन्दोज़ी को तह कर रखा है, उसे फैलाने वाला क़रार दे ताके उसके अजाएब व रमूज़ की हक़ीक़तों और उसकी मुतनब्बेह करने वाली मिसालों को के जिन्हें उठाने से पहाड़ अपने इस्तेहकाम के बावजूद आजिज़ आ चुके हैं हमारे दिलों में उतार दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये हमारे ज़ाहिर को हमेशा सलाह व रशद से आरास्ता रख और हमारे ज़मीर की फ़ितरी सलामती से ग़लत तसव्वुरात की दख़ल दरान्दाज़ी को रोक दे और हमारे दिलों की कसाफ़तों और गुनाहों की आलूदगियों को धो दे और उसके ज़रिये हमारे परागन्दा उमूर की शीराज़ा बन्दी कर और मैदाने हश्र में हमारी झुलसती हुई दोपहरों की तपिश व तशनगी बुझा दे और सख़्त ख़ौफ़ व हेरास के दिन जब क़ब्रों से उठें तो हमें अम्न व आफ़ियत के जामे पहना दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये फ़क्ऱो एहतियाज की वजह से हमारी ख़स्तगी व बदहाली का तदारूक फ़रमा और ज़िन्दगी की कशाइश और फ़राख़ रोज़ी की आसूदगी का रूख़ हमारे जानिब फेर दे और बुरी आदात और पस्त इख़लाक़ से हमें दूर कर दे और कुफ्ऱ के गढ़े (में गिरने) और निफ़ाक़ अंगेज़ चीज़ों से बचा ले ताके वह हमें क़यामत में तेरी ख़ुशनूदी व जन्नत की तरफ़ बढ़ाने वाला और दुनिया में तेरी नाराज़गी और हुदूद शिकनी से रोकने वाला हो और इस अम्र पर गवाह हो के जो चीज़ तेरे नज़दीक हलाल थी उसे हलाल जाना और जो हराम थी उसे हराम समझा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के वसीले से मौत के हंगामे नज़अ की अज़ीयतों, कराहने की सख़्तियों और जाँकनी की लगातार हिचकियों को हम पर आसान फ़रमा जबके जान गले तक पहुंच जाए और कहा जाए के कोई झाड़ फूंक करने वाला है (जो कुछ तदारूक करे) और मलकुल मौत ग़ैब के पर्दे चीर कर क़ब्ज़े रूह के लिये सामने आए और मौत की कमान में फ़िराक़ की दहशत के तीर जोड़कर अपने निशाने की ज़द पर रख ले और मौत के ज़हरीले जाम में ज़हरे हलाहल घोल दे और आख़ेरत की तरफ़ हमारा चल-चलाव और कूच क़रीब हो और हमारे आमाल हमारी गर्दन का तौक़ बन जाएं और क़ब्रें रोज़े हष्र की साअत तक आरामगाह क़रार पाएं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और कहन्गी व बोसीदगी के घर में उतरने और मिट्टी की तहों में मुद्दत तक पड़े रहने को हमारे लिये मुबारक करना और दुनिया से मुंह मोड़ने के बाद क़ब्रों को हमारा अच्छा घर बनाना और अपनी रहमत से हमारे लिये गौर की तंगी को कुशादा कर देना और हश्र के आम इज्तेमाअ के सामने हमारे मोहलक गुनाहों की वजह से हमें रूसवा न करना और आमाल के पेश होने के मक़ाम पर हमारी ज़िल्लत व ख़्वारी की वज़ा पर रहम फ़रमाना और जिस दिन जहन्नम के पुल पर से गुज़रना होगा, तो उसके लड़खड़ाने के वक़्त हमारे डगमगाते हुए क़दमों को जमा देना और क़यामत के दिन हमें उसके ज़रिये हर अन्दोह और रोज़े हश्र की सख़्त हौलनाकियों से निजात देना और जब के हसरत व निदामत के दिन ज़ालिमों के चेहरे सियाह होंगे हमारे चेहरों को नूरानी करना और मोमेनीन के दिलों में हमारी मोहब्बत पैदा कर दे और ज़िन्दगी को हमारे लिये दुश्वारगुज़ार न बना।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) जो तेरे ख़ास बन्दे और रसूल (स0) हैं उन पर रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह उन्होंने तेरा पैग़ाम पहुंचाया, तेरी शरीयत को वाज़ेह तौर से पेश किया और तेरे बन्दों को पन्द व नसीहत की। ऐ अल्लाह! हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम को क़यामत के दिन तमाम नबियों से मन्ज़िलत के लेहाज़ से मुक़र्रबतर शिफ़ाअत के लेहाज़ से बरतर, क़द्र व मन्ज़िलत के लेहाज़ से बुज़ुर्गतर और जाह व मरतबत के एतबार से मुमताज़तर क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनके ऐवान (अज़्ज़ व शरफ़) को बलन्द, उनकी दलील व बुरहान को अज़ीम और उनके मीज़ान (अमल के पल्ले) को भारी कर दे। उनकी शिफ़ाअत को क़ुबूल फ़रमा और उनकी मन्ज़िलत को अपने से क़रीब कर, उनके चेहरे को रौशन, उनके नूर को कामिल और उनके दरजे को बलन्द फ़रमा। और हमें उन्हीं के आईन पर ज़िन्दा रख और उन्हीं के दीन पर मौत दे और उन्हीं की षाहेराह पर गामज़न कर और उन्हीं के रास्ते पर चला और हमें उनके फ़रमाबरदारों में से क़रार दे और उनकी जमाअत में महशूर कर और उनके हौज़ पर उतार और उनके साग़र से सेराब फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जिसके ज़रिये उन्हें बेहतरीन नेकी, फ़ज़्ल और इज़्ज़त तक पहुंचा दे जिसके वह उम्मीदवार हैं। इसलिये के तू वसीअ रहमत और अज़ीम फ़ज़्ल व एहसान का मालिक है। ऐ अल्लाह! उन्होंने जो तेरे पैग़ामात की तबलीग़ की, तेरी आयतों को पहुचाया, तेरे बन्दों को पन्द व नसीहत की और तेरी राह में जेहाद किया। इन सबकी उन्हें जज़ा दे जो हर उस जज़ा से बेहतर हो जो तूने मुक़र्रब फ़रिश्तों और बरगुज़ीदा मुरसल नबीयों को अता की हो। उन पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर सलाम हो और अल्लाह तआला की रहमतें और बरकतें उनके शामिले हाल हों।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 41st dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 इकतालीसवीं दुआ
पर्दापोशी और हिफ़्ज़ व निगेहदाश्त के लिये यह दुआ पढ़ते

 
बारे इलाहा रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरे लिये एज़ाज़ व इकराम की मसनद बिछा दे, मुझे रहमत के सरचश्मों पर उतार दे, वुसते बेहिश्त में जगह दे और अपने हाँ से नाकाम पलटाकर रन्जीदा न कर और अपनी रहमत से नाउम्मीद करके हरमाँ नसीब न बना दे। मेरे गुनाहों का क़सास न ले और मेरे कामों का सख़्ती से मुहासेबा न कर। मेरे छुपे हुए राज़ों को ज़ाहिर न फ़रमा और मेरे मख़फ़ी हालात पर से पर्दा न उठा और मेरे आमाल को अद्ल व इन्साफ़ के तराज़ू पर न तौल और अशराफ़ की नज़रों के सामने मेरी बातेनी हालत को आशकार न कर। जिसका ज़ाहिर होना मेरे लिये बाएसे नंग व आर हो वह उनसे छिपाए रख और तेरे हुज़ूर जो चीज़ ज़िल्लत व रूसवाई का बाएस हो वह उनसे पोशीदा रहने दे। अपनी रज़ामन्दी के ज़रिेये मेरे दर्जे को बलन्द और अपनी बख़्शिश के वसीले से मेरी बन्दगी व करामत की तकमील फ़रमा और उन लोगों के गिरोह में मुझे दाखि़ल कर जो दाएँ हाथ से नामाए आमाल लेने वाले हैं और उन लोगों की राह पर ले चल जो (दुनिया व आख़ेरत में) अम्न व आफ़ियत से हमकिनार हैं और मुझे कामयाब लोगों के ज़मरह में क़रार दे और नेकोकारों की महफ़िलों को मेरी वजह से आबाद व पुर रौनक़ बना। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 40th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 चालीसवीं दुआ
जब किसी की ख़बरे मर्ग सुनते या मौत को याद करते तो यह दुआ पढ़ते

 
ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें तूल तवील उम्मीदों से बचाए रख और पुरख़ुलूस आमाल के बजा लाने से दामने उम्मीद को कोताह कर दे ताके हम एक घड़ी के बाद दूसरी घड़ी के तमाम करने, एक दिन के बाद दूसरे दिन के गुज़ारने, एक सांस के बाद दूसरी सांस के आने और एक क़दम के बाद दूसरे क़दम के उठने की आस न रखें। हमें फ़रेब आरज़ू और फ़ित्नाए उम्मीद से महफ़ूज़ व मामून रख। और मौत को हमारा नसबलऐन क़रार दे और किसी दिन भी हमें उसकी याद से ख़ाली न रहने दे और नेक आमाल में से हमें ऐसे अमले ख़ैर की तौफ़ीक़ दे जिसके होते हुए हम तेरी जानिब बाज़गश्त में देरी महसूस करें और जल्द से जल्द तेरी बारगाह में हाज़िर होने के आरज़ू मन्द हों। इस हद तक के मौत हमारे उन्स की मन्ज़िल हो जाए जिससे हम जी लगाएं और उलफ़त की जगह बन जाए जिसके हम मुश्ताक़ हों और ऐसी अज़ीज़ हो जिसके क़रीब को हम पसन्द करें। जब तू उसे हम पर वारिद करे और हम पर ला उतारे तो उसकी मुलाक़ात के ज़रिये हमें सआदतमन्द बनाना और जब वह आए तो हमें उससे मानूस करना और उसकी मेहरबानी से हमें बदबख़्त न क़रार देना और न उसकी मुलाक़ात से हमको रूसवा करना और उसे अपनी मग़फ़ेरत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़े और रहमत की कुन्जियों में से एक कलीद क़रार देना और हमें इस हालत में मौत आए के हम हिदायतयाफ़्ता हों गुमराह न हों। फ़रमाबरदार हों और (मौत से) नफ़रत करने वाले न हों, तौबागुज़ार हों ख़ताकार और गुनाह पर इसरार करने वाले न हों। ऐ नेकोकारों के अज्र व सवाब का ज़िम्मा लेने वाले और बदकिरदारों के अमल व किरदार की इस्लाह करने वाले।
 

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 39th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



उन्तालीसवीं दुआ
तलबे अफ़ो व रहमत के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हर अम्रे हराम से मेरी ख़्वाहिश (का ज़ोर) तोड़ दे और हर गुनाह से मेरी हिरस का रूख़ मोड़ दे और हर मोमिन और मोमिना, मुस्लिम और मुस्लिमा की ईज़ारसानी से मुझे बाज़ रख। 
ऐ मेरे माबूद! जो बन्दा भी मेरे बारे में ऐसे अम्र का मुरतकिब हो जिसे तूने उस पर हराम किया था और मेरी इज़्ज़त पर हमलावर हुआ हो जिससे तूने उसे मना किया था। मेरा मज़लेमा लेकर दुनिया से उठ गया हो या हालते हयात में उसके ज़िम्मे बाक़ी हो तो उसने मुझ पर जो ज़ुल्म किया है उसे बख़्श दे और मेरा जो हक़ लेकर चला गया है, उसे माफ़ कर दे और मेरी निस्बत जिस अम्र का मुरतकिब हुआ है उस पर उसे सरज़न्श न कर और मुझे अर्ज़दह करने के बाएस उसे रूसवा न फ़रमा और जिस अफ़ो व दरगुज़र की मैंने उनके लिये कश की है और जिस करम व बख़्शिश को मैंने उनके लिये रवा रखा है उसे सदक़ा करने वालों के सदक़े से पाकीज़ातर और तक़र्रूब चाहने वालों के अतियों से बलन्दतर क़रार दे और इस अफ़ो व दरगुज़र के एवज़ तू मुझसे दरगुज़र कर और उनके लिये दुआ करने के सिले में मुझे अपनी रहमत से सरफ़राज़ फ़रमा ताके हम में से हर एक तेरे फ़ज़्ल व करम की बदौलत ख़ुश नसीब हो सके और तेरे लुत्फ़ व एहसान की वजह से नजात पा जाए।

ऐ अल्लाह! तेरे बन्दों में से जिस किसी को मुझसे कोई ज़रर पहुंचा हो या मेरी जानिब से कोई अज़ीयत पहुंची हो या मुझसे या मेरी वजह से उस पर ज़ुल्म हुआ हो इस तरह के मैंने उसके किसी हक़ को ज़ाया किया हो या उसके किसी मज़ालिमे की दादख़्वाही न की हो। तू  मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी ग़िना व तवंगरी के ज़रिये उसे मुझसे राज़ी कर दे और अपने पास से उसका हक़ बे कम व कास्त अदा कर दे। फिर यह के उस चीज़ से जिसका तेरे हुक्म के तहत सज़ावार हूं, बचा ले और जो तेरे अद्ल का तक़ाज़ा है उससे निजात दे, इसलिये के मुझे तेरे अज़ाब के बरदाश्त करने की ताब नहीं और तेरी नाराज़गी के झेल ले जाने की हिम्मत नहीं। लेहाज़ा अगर तू मुझे हक़ व इन्साफ़ की रू से बदला देगा तो मुझे हलाक कर देगा। और अगर दामने रहमत में नहीं ढांपेगा तो मुझे तबाह कर देगा।

ऐ अल्लाह! ऐ मेरे माबूद! मैं तुझसे उस चीज़ का तालिब हूं जिसके अता करने से तेरे हाँ कुछ कमी नहीं होती और वह बार तुझ पर रखना चाहता हूँ जो तुझे गरांबार नहीं बनाता और तुझसे इस जान की भीक मांगता हूं जिसे तूने इसलिये पैदा नहीं किया के उसके ज़रिये ज़रर व ज़ेयां से तहफ़्फ़ुज़ करे या मुनफ़अत की राह निकाले बल्कि इसलिये पैदा किया ताके इस अम्र का सुबूत बहम पहुंचाए और इस बात पर दलील लाए के तू इस जैसी और इस तरह की मख़लूक़ पैदा करने पर क़ादिर व तवाना है और तुझसे इस अम्र का ख़्वास्तगार हूं के मुझे उन गुनाहों से सुबकबार कर दे जिनका बार मुझे हलकान किये हुए है और तुझसे मदद मांगता हूं उस चीज़ की निस्बत जिसकी गरांबारी ने मुझे आजिज़ कर दिया है। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे नफ़्स को बावजूद यह के उसने ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया है, बख़्श दे और अपनी रहमत को मेरे गुनाहों का बारे गराँ उठाने पर मामूर कर इसलिये के कितनी ही मरतबा तेरी रहमत गुनहगारों के हमकिनार और तेरा अफ़ो व करम ज़ालिमों के शामिले हाल रहा है। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन लोगों के लिये नमूना बना जिन्हें तूने अपने अफ़ो के ज़रिये ख़ताकारों के गिरने के मक़ामात से ऊपर उठा लिया। और जिन्हें तूने अपनी तौफ़ीक़ से गुनहगारों के मोहलकों से बचा लिया तो वह तेरे अफ़ो व बख़्शिश के वसीले से तेरी नाराज़गी के बन्धनों से छूट गए और तेरे एहसान की बदौलत अद्ल की लग़्िज़शों से आज़ाद हो गए। 
ऐ मेरे अल्लाह! अगर तू मुझे माफ़ कर दे तो तेरा यह सुलूक उसके साथ होगा जो सज़ावारे उक़ूबत होने से इन्कारी नहीं है और न मुस्तहेक़े सज़ा होने से अपने को बरी समझता है। यह तेरा बरताव उसके साथ होगा ऐ मेरे माबूद। जिसका ख़ौफ़ उम्मीदे अफ़ो से बढ़ा हुआ है और जिसकी निजात से नाउम्मीदी, रेहाई की तवक़्क़ो से क़वीतर है। यह इसलिये नही ंके उसकी ना उम्मीदी रहमत से मायूसी हो या यह के उसकी उम्मीद फ़रेबख़ोरदगी का नतीजा हो बल्कि इसलिये के उसकी बुराइयां नेकियों के मुक़ाबले में कम और गुनाहों के तमाम मवारिद में उज़्र ख़्वाही के वजूह कमज़ोर हैं। लेकिन ऐ मेरे माबूद! तू इसका सज़ावार है के रास्तबाज़ लोग भी तेरी रहमत पर मग़रूर होकर फ़रेब न खाएं और गुनहगार भी तुझसे नाउम्मीद न हों। इसलिये के तू वह रब्बे अज़ीम है के किसी पर फ़ज़्ल व एहसान से दरीख़ नहीं करता और किसी से अपना हक़ पूरा पूरा वसूल करने के दरपै नहीं होता। तेरा ज़िक्र तमाम नाम आवरों (के ज़िक्र) से बलन्दतर है और तेरे असमाअ इससे के दूसरे हसब व नसब वाले उनसे मौसूम हों मुनज़्जह हैं। तेरी नेमतें तमाम कायनात में फैली हुई हैं। लेहाज़ा इस सिलसिले में तेरे ही लिये हम्द व सताइश है। ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।