Wednesday, 8 February 2012

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 15th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

पन्द्रहवीं दुआ
जब किसी बीमारी या कर्ब व अज़ीयत में मुब्तिला होते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सपास है इस सेहत व सलामतीए बदन पर जिसमें हमेषा ज़िन्दगी बसर करता रहा और तेरे ही लिये हम्द व सपास है उस मर्ज़ पर जो अब मेरे जिस्म में तेरे हुक्म से रूनुमा हुआ है। ऐ माबूद! मुझे नही मालूम के इन दोनों हालतों में से कौन सी हालत पर तू षुक्रिया का ज़्यादा मुस्तहेक़ है और इन दोनों वक़्तों में से कौन सा वक़्त तेरी हम्द व सताइश के ज़्यादा लाएक़ है। आया सेहत के लम्हे जिनमें तूने अपनी पाकीज़ा रोज़ी को मेरे लिये ख़ुषगवार बनाया और अपनी रज़ा व ख़ुषनूदी और फ़ज़्ल व एहसान के तलब की उमंग मेरे दिल में पैदा की और उसके साथ अपनी इताअत की तौफ़ीक़ देकर उससे ओहदाबरा होने की क़ूवत बख़्षी या यह बीमारी का ज़माना जिसके ज़रिये मेरे गुनाहों को दूर किया और नेमतों के तोहफ़े अता फ़रमाए ताके उन गुनाहों का बोझ हल्का कर दे जो मेरी पीठ को गराँबार बनाए हुए हैं और उन बुराइयों से पाक कर दे जिनमें डूबा हुआ हूँ और तौबा करने पर मुतनब्बे कर दे और गुज़िष्ता नेमत (तन्दरूस्ती) की याददेहानी से (कुफ्राने नेमत के) गुनाह को महो कर दे और इस बीमारी के असना में कातिबाने आमाल मेरे लिये वह पाकीज़ा आमाल भी लिखते रहे जिनका न दिल में तसव्वुर हुआ था न ज़बान पर आए थे और न किसी अज़ो ने उसकी तकलीफ़ गवारा की थी। यह सिर्फ़ तेरा तफ़ज़्ज़ुल व एहसान था जो मुझ पर हुअ। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और जो कुछ तूने मेरे लिये पसन्द किया है वही मेरी नज़रों में पसन्दीदा क़रार दे और जो मुसीबत मुझ पर डाल दी है उसे सहल व आसान कर दे और मुझे गुज़िष्ता गुनाहों की आलाइष से पाक और साबेक़ा बुराइयों को नीस्त व नाबूद कर दे और तन्दरूस्ती की लज़्ज़त से कामरान अैर सेहत की ख़ुषगवारी से बहराअन्दोज़ कर और मुझे इस बीमारी से छुड़ाकर अपने अफ़ो की जानिब ले और इस हालते उफ़तादगी से बख़्षिष व दरगुज़र की तरफ़ फेर दे और इस बेचैनी से निजात देकर अपनी राहत तक और इस षिद्दत व सख़्ती को दूर करके कषाइष व वुसअत की मन्ज़िल तक पहुंचा दे इसलिये के तू बे इस्तेहक़ाक़ एहसान करने वाला और गरांबहा नेमतें बख़्षने वला है और तू ही बख़्षिष व करम का मालिक और अज़मत व बुज़ुर्गी का सरमायादार है।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 14th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

चौदहवीं दुआ
जब आप पर कोई ज़्यादती होती या ज़ालिमों से कोई नागवार बात देखते तो यह दुआ पढ़ते थे
ऐ वह जिससे फ़रियाद करने वालों की फ़रयादें पोशीदा नहीं हैं। ऐ वह जो उनकी सरगुज़िश्तों के सिलसिले में गवाहों की गवाही का मोहताज नहीं है, ऐ वह जिसकी नुसरत मज़लूमों के हम रकाब और जिसकी मदद ज़ालिमों से कोसों दूर है। ऐ मेरे माबूद! तेरे इल्म में हैं वह ईज़ाएं जो मुझे फ़लाँ इब्ने फ़लाँ से उसके तेरी नेमतों पर इतराने और तेरी गिरफ़्त से ग़ाफ़िल होने के बाएस पहुँची हैं। जिन्हें तूने उस पर हराम किया था और मेरी हतके इज़्ज़त का मुरतकिब हुआ, जिससे तूने उसे रोका था। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और अपनी क़ूवत व तवानाई से मुझ पर ज़ुल्म करने वाले और मुझसे दुश्मनी करने वाले को ज़ुल्म व सितम से रोक दे और अपने इक़्तेदार के ज़रिये उसके हरबे कुन्द कर दे और उसे अपने ही कामांे में उलझाए रख और जिससे आमादा दुश्मनी है उसके मुक़ाबले में उसे बेदस्त व पा कर दे। ऐ माबूद! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और उसे मुझ पर ज़ुल्म करने की खुली छूट न दे और उसके मुक़ाबले में अच्छे असलूब से मेरी मदद फ़रमा और उसके बुरे कामों जैसे कामों से मुझे महफ़ूज़ रख और उसकी हालत ऐसी हालत न होने दे। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उसके मुक़ाबले में ऐसी बरवक़्त मदद फ़रमा जो मेरे ग़ुस्से को ठण्डा कर दे और मेरे ग़ैज़ व ग़ज़ब का बदला चुकाए। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और उसके ज़ुल्म व सितम के एवज़ अपनी मुआफ़ी और उसकी बदसुलूकी के बदले में अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके हर नागवार चीज़ तेरी नाराज़गी के मुक़ाबले में हैच है और तेरी नाराज़गी न हो तो हर (छोटी बड़ी) मुसीबत आसान है। बारे इलाहा! जिस तरह ज़ुल्म सहना तूने मेरी नज़रों में नापसन्द किया है, यूँ ही ज़ुल्म करने से भी मुझे बचाए रख। ऐ अल्लाह! मैं तेरे सिवा किसी से शिकवा नहीं करता और तेरे अलावा किसी हाकिम से मदद नहीं चाहता। हाशा के मैं ऐसा चाहूँ तो रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और मेरी दुआ को क़ुबूलियत से और मेरे शिकवे को सूरते हाल की तबदीली से जल्दी हमकिनार कर और मेरा इस तरह इम्तेहान न करना के तेरे अद्ल व इन्साफ़ से मायूस हो जाऊँ और मेरे दुश्मन को इस तरह न आज़माना के वह तेरी सज़ा से बेख़ौफ़ होकर मुझ पर बराबर ज़ुल्म करता रहे और मेरे हक़ पर छाया रहे और उसे जल्द अज़ जल्द उस अज़ाब से रू शिनास कर जिससे तूने सितमगारों को डराया धमकाया है और मुझे क़ुबूलियते दुआ का वह असर दिखा जिसका तूने बेबसों से वादा किया है। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे तौफ़ीक़ दे के जो सूद-ओ-ज़ियां तूने मेरे लिये मुक़द्दर कर दिया है उसे (बतय्यब ख़ातिर) क़ुबूल करूं और जो कुछ तूने दिया है और जो कुछ लिया है उस पर मुझे राज़ी व ख़ुशनूद रख और मुझे सीधे रास्ते पर लगा और ऐसे काम में मसरूफ़ रख जो आफ़त व ज़ियाँ से बरी हों। ऐ अल्लाह! अगर तेरे नज़दीक मेरे लिये यही बेहतर हो के मेरी दादरसी को ताख़ीर में डाल दे और मुझ पर ज़ुल्म ढाने वाले से इन्तेक़ाम लेने को फ़ैसले के दिन और दावेदारों के महले इजतेमाअ के लिये उठा रखे तो फिर मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल कर और अपनी जानिब से नीयत की सच्चाई और सब्र की पाएदारी से मेरी मदद फ़रमा और बुरी ख़्वाहिश और हरीसों की बेसब्री से बचाए रख और जो सवाब तूने मेरे लिये ज़ख़ीरा किया है और जो सज़ा व उक़ूबत मेरे दुश्मन के लिये मुहय्या की है उसका नक़्शा मेरे दिल में जमा दे और उसे अपने फ़ैसले क़ज़ा व क़द्र पर राज़ी रहने का ज़रिया और अपनी पसन्दीदा चीज़ों पर इत्मीनान व वसूक़ का सबब क़रार दे। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहान के पालने वाले। बेशक तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक है और तेरी क़ुदरत से कोई चीज़ बाहर नहीं है।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 13th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

तेरहवीं दुआ
 ख़ुदावन्द आलम से तलबे हाजात के सिलसिले में हज़रत की दुआ

ऐ माबूद! ऐ वह जो तलबे हाजात की मन्ज़िले मुन्तहा है ऐ वह जिसके यहां मुरादों तक रसाई होती है। ऐ वह जो अपनी नेमतें क़ीमतों के एवज़ फ़रोख़्त नहीं करता और न अपने अतियें को एहसान जताकर मुकद्दर करता है, ऐ वह जिसके ज़रिये बेनियाज़ी हासिल होती है और जिससे बेनियाज़ नहीं रहा जा सकता। ऐ वह जिसकी ख़्वाहिश व रग़बत की जाती है और जिससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। ऐ वह जिसके ख़ज़ाने तलब व सवाल से ख़त्म नहीं होते और जिसकी हिकमत व मसलेहत को वसाएल व असबाब के ज़रिये तबदील नहीं किया जा सकता। ऐ वह जिससे हाजतमन्दों का रिश्ताए एहतियाज क़ता नहीं होता और जिसे पुकारने वालों की सदा ख़स्ता व मलोल नहीं करती। तूने ख़ल्क़ से बेनियाज़ होने की सिफ़त का मुज़ाहेरा किया है और तू यक़ीनन इनसे बेनियाज़ है और तूने उनकी तरफ़ फ़क्र व एहतियाज की निस्बत दी है और वह बेशक तेरे मोहताज हैं लेहाज़ा जिसने अपने इफ़लास के रफ़ा करने के लिये तेरा इरादा किया और अपनी एहतियाज के दूर करने के लिये तेरा क़स्द किया उसने अपनी हाजत को उसके महल व मुक़ाम से तलब किया और अपने मक़सद तक पहुंचने का सही रास्ता इख़्तेयार किया। और जो अपनी हाजत को लेकर मख़लूक़ात में से किसी एक की तरफ़ मुतवज्जोह हुआ या तेरे अलावा दूसरे को अपनी हाजत बरआरी का ज़रिया क़रार दिया वह हरमाँनसीबी से दो चार और तेरे एहसान से महरूमी का सज़ावार हुआ। बारे इलाहा। मेरी तुझसे एक हाजत है जिसे पूरा करने से मेरी ताक़त जवाब दे चुकी है और मेरी तदबीर व चाराजोई भी नाकाम होकर रह गई है और मेरे नफ़्स ने मुझे यह बात ख़ुशनुमा सूरत में दिखाई के मैं अपनी हाजत को उसके सामने पेश करूँ जो ख़ुद अपनी हाजतें तेरे सामने पेश करता है और अपने मक़ासिद में तुझसे बेनियाज़ नहीं है। यह सरासर ख़ताकारों की ख़ताओं में से एक ख़ता और गुनाहों की लग़्िज़शों में से एक लग़्िज़श थी लेकिन तेरे याद दिलाने से मैं अपनी ग़फ़लत से होशियार हुआ और तेरी तौफ़ीक़ ने सहारा दिया तो ठोकर खाने से संभल गया और तेरी राहनुमाई की बदौलत ग़लत एक़दाम से बाज़ आया और वापस पलट आया और मैंने कहा वाह सुबहान अल्लाह। किस तरह एक मोहताज दूसरे मोहताज से सवाल कर सकता है, और कहां एक रादार दूसरे नादार से रूजू कर सकता है (जब यह हक़ीक़त वाज़ेह हो गई) तो मैंने ऐ मेरे माबूद। पूरी रग़बत के साथ तेरा इरादा किया और तुझ पर भरोसा करते हुए अपनी उम्मीदें तेरे पास लाया हूँ और मैंने इस अम्र को बख़ूबी जान लिया है के मेरी कसीर हाजतें तेरी वुसअते रहमत के सामने हैच हैं, तेरे दामने करम की वुसअत किसी के सवाल करने से तंग नहीं होती और तेरा दस्ते करम अता व बख़्शिश में हर हाथ से बलन्द है। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने करम से मेरे साथ तफ़ज़्ज़ल व एहसान की रविश इख़्तेयार और अपने अद्ल से काम लेते हुए मेरे इस्तेहक़ाक़ की रू से फ़ैसला न कर क्योंके मैं पहला वह हाजतमन्द नहीं हूँ जो तेरी तरफ़ मुतवज्जोह हुआ और तूने उसे अता किया हो हालांके वह दर किये जाने का मुस्तहेक़ हो और पहला वह साएल नहीं हूं जिसने तुझसे मांगा हो और तूने उस पर अपना फ़ज़्ल किया हो हालांके वह महरूम किये जाने के क़ाबिल हो। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी दुआ का क़ुबूल करने वाला, मेरी पुकार पर इत्तेफ़ात फ़रमाने वाला, मेरी अज्ज़वज़ारी पर रहम करने वाला और मेरी आवाज़ का सुनने वाला साबित हो और मेरी उम्मीद जो तुझसे वाबस्ता है उसे न तोड़ और मेरा वसीला अपने से क़ता न कर। और मुझे इस मक़सद और दूसरे मक़ासिद में अपने सिवा दूसरे की तरफ़ मुतवज्जोह न होने दे। और इस मक़ाम से अलग होने से पहले मेरी मुश्किल कुशाई और मुआमलात में हुस्ने तक़दीर की कारफ़रमाई से मेरे मक़सद के बर लाने, मेरी हाजत के रवा करने और मेरे सवाल के पूरा करने का ख़ुद ज़िम्मा ले। और मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जो दाएमी और रोज़ाफ़्ज़ो हो, जिस का ज़माना ग़ैर मोहतमिम और जिसकी मुद्दत बेपायां हो। और उसे मेरे लिये मुअय्यन और मक़सद बरआरी का ज़रिया क़रार दे। बेशक तू वसीअ रहमत और जूद व करम की सिफ़त का मालिक है। ऐ मेरे परवरदिगार! मेरी कुछ हाजतें यह हैं (इस मक़ाम पर अपनी हाजतें बयान करो, फिर सजदा करो और सजदे की हालत में यह कहो) तेरे फ़ज़्ल व करम ने मेरी दिले जमई और तेरे एहसान ने रहनुमाई की, इस वजह से मैं तुझसे तेरे ही वसीले से मोहम्मद (स0) व आले मोहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम के ज़रिये सवाल करता हूं के मुझे (अपने दर से) नाकाम व नामुराद न फेर।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 12th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

 बारहवीं दुआ
एतराफ़े गुनाह और तलबे तौबा के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ
 
ऐ अल्लाह! मुझे तीन बातें तेरी बारगाह में सवाल करने से रोकती हैं और एक बात इस पर आमादा करती है। जो बातें रोकती हैं उनमें से 
  1. एक यह है के जिस अम्र का तूने हुक्म दिया मैंने उसकी तामील में सुस्ती की
  2. दूसरे यह के जिस चीज़ से तूने मना किया उसकी तरफ़ तेज़ी से बढ़ा। 
  3. तीसरे जो नेमतें तूने मुझे अता कीं उनका शुक्रिया अदा करने में कोताही की 
और जो बात मुझे सवाल करने की जराअत दिलाती है वह तेरा तफ़ज़्जुल व एहसान है जो तेरी तरफ़ रूजूअ होने वालों और हुस्ने ज़न के साथ आने वालों के हमेशा शरीके हाल रहा है। क्योंके तेरे तमाम एहसानात सिर्फ़ तेरे तफ़ज़्ज़ल की बिना पर हैं और तेरी हर नेमत बग़ैर किसी साबेक़ा इस्तेहक़ाक़ के है। अच्छा फिर ऐ मेरे माबूद! मैं तेरे दरवाज़ा-ए-इज़्ज़ो जलाल पर एक अब्दे मुतीअ व ज़लील की तरह खड़ा हूँ और शर्मिन्दगी के साथ एक फ़क़ीर व मोहताज की हैसियत से सवाल करता हूँ इस अम्र का इक़रार करते हुए के तेरे एहसानात के वक़्त तर्के मासियत के अलावा और कोई इताअत (अज़ क़बीले हम्द व शुक्र) न कर सका, और मैं किसी हालत में तेरे इनआम व एहसान से ख़ाली नहीं रहा। तो क्या ऐ मेरे माबूद! यह बदआमालियों का इक़रार तेरी बारगाह में मेरे लिये सूदमन्द हो सकता है और वह बुराइयां जो मुझसे सरज़द हुई हैं उनका एतराफ़ तेरे अज़ाब से निजात का बाएस क़रार पा सकता है। या यह के तूने इस मक़ाम पर मुझ पर ग़ज़ब करने का फ़ैसला कर लिया है और दुआ के वक़्त अपनी नाराज़गी को मेरे लिये बरक़रार रखा है। तू पाक व मुनज़्ज़ह है। मैं तेरी रहमत से मायूस नहीं हूँ इसलिये के तूने अपनी बारगाह की तरफ़ मेरे लिये तौबा का दरवाज़ा खोल दिया है, बल्कि मैं उस बन्दए ज़लील की सी बात कह रहा हूँ जिसने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया और अपने परवरदिगार की हुरमत का लेहाज़ न रखा। जिसके गुनाह अज़ीम रोज़ अफ़ज़ोर हैं। जिसकी ज़िन्दगी के दिन गुज़र गए और गुज़रे जा रहे हैं। यहाँ तक के जब उसने देखा के मुद्दते अमल तमाम हो गई और उम्र अपनी आख़ेरी हद को पहुँच गई और यह यक़ीन हो गया के अब तेरे हाँ हाज़िर हूए बग़ैर कोई चारा और तुझ से निकल भागने की सूरत नहीं है। तो वह हमहतन तेरी तरफ़ रूजु हुआ और सिदक़े नीयत से तेरी बारगाह में तौबा की। अब वह बिलकुल पाक व साफ़ दिल के साथ तेरे हुज़ूर खड़ा हुआ। फिर कपकपाती आवाज़ से और दबे लहजे में तुझे पुकारा इस हालत में तुझे पुकारा इस हालत में के ख़ुशू व तज़ल्लुल के साथ तेरे सामने झुक गया और सर को न्योढ़ा कर तेरे आगे ख़मीदा हो गया। ख़ौफ़ से इसके दोनों पावों थर्रा रहे हैं और सीले अश्क उसके रूख़सारों पर रवाँ है और तुझे इस तरह पुकार रहा है:- 
 
ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले, ऐ उन सबसे बढ़कर रहम करने वाले जिनसे तलबगाराने रहम व करम बार बार रहम की इल्तिजाएं करते हैं, ऐ उन सबसे ज़्यादा मेहरबानी करने वाले जिनके गिर्द माफ़ी चाहने वाले घेरा डाले रहते हैं। ऐ वह जिसका अफ़ो व वरगुज़ाँ के इन्तेक़ाम से फ़ज़ोंतर है। ऐ वह जिसकी ख़ुशनूदी उसकी नाराज़गी से ज़्यादा है।
 
ऐ वह जो बेहतरीन अफ़ो व दरगुज़र के बाएस मख़लूक़ात के नज़दीक हम्द व सताइश का मुस्तहक़ है। ऐ वह जिसने अपने बन्दों को क़ुबूले तौबा का ख़ौगीर किया है, और तौबा के ज़रिये उनके बिगड़े हुए कामों की दुरूस्ती चाही है। ऐ वह जो उनके ज़रा से अमल पर ख़ुश हो जाता है और थोड़े से काम का बदला ज़्यादा देता है।
 
ऐ वह जिसने उनकी दुआओं को क़ुबूल करने का ज़िम्मा लिया है। ऐ वह जिसने अज़रूए तफ़ज़्ज़ुल व एहसान बेहतरीन जज़ा का वादा किया है जिन लोगों ने तेरी मासियत की और तूने उन्हें बख़्श दिया मैं उनसे ज़्यादा गुनहगार नहीं हूं जिन्होंने तुझसे माज़ेरत की और तूने उनकी माज़ेरत को क़ुबूल कर लिया उनसे ज़्यादा क़ाबिले सरज़न्श नहीं हूँ और जिन्होंने तेरी बारगाह में तौबा की और तूने (तौबा को क़ुबूल फ़रमाकर) उन पर एहसान किया उनसे ज़्यादा ज़ालिम नहीं हूँ। लेहाज़ा मैं अपने इस मौक़ूफ़ को देखते हुए तेरी बारगाह में तौबा करता हूँ उस शख़्स की सी तौबा जो अपने पिछले गुनाहों पर नादिम और ख़ताओं के हुजूम से ख़ौफ़ज़दा और जिन बुराइयों का मुरतकिब होता रहा है उन पर वाक़ेई शर्मसार हूँ और जानता हूं के बड़े से बड़े गुनाह को माफ़ कर देना तेरे नज़दीक कोई बड़ी बात नहीं है और बड़ी से बड़ी ख़ता से दरगुज़र करना तेरे लिये कोई मुश्किल नहीं है और सख़्त से सख़्त जुर्म से चश्मपोशी करना तुझे ज़रा गराँ नहीं है। यक़ीनन तमाम बन्दों में से वह बन्दा तुझे ज़्यादा महबूब है जो तेरे मुक़ाबले में सरकशी न करे गुनाहों पर मसर न हो और तौबा व अस्तग़फ़ार की पाबन्दी करे। और मैं तेरे हुज़ूर ग़ुरूर व सरकशी से दस्तबरदार होता हूँ और गुनाहों पर इसरार से तेरे दामन में पनाह मांगता हूँ और जहाँ-जहाँ कोताही की है उसके लिये अफ़ो व बख़्शिश का तलबगार हूँ। और जिन कामों के अन्जाम देने से आजिज़ हूँ उनमें तुझ से मदद का ख़्वास्तगार हूँ।
 
ऐ अल्लाह! तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और तेरे जो जो हुक़ूक़ मेरे ज़िम्मे आएद होते हैं उन्हें बख़्श दे और जिस पादाश का मैं सज़ावार हूँ उससे मोआफ़ी दे और मुझे उस अज़ाब से पनाह दे जिससे गुनहगार हरासाँ हैं। इसलिये के तू माफ़ कर देने पर क़ादिर है और तू उस सिफ़ते अफ़ो व दरगुज़र में मारूफ़ है। और तेरे सिवा हाजत के पेश करने की कोई जगह नहीं है और न तेरे अलावा कोई मेरे गुनाहों का बख़्शने वाला है। हाशा व कला कोई और बख़्शने वाला नहीं है। और मुझे अपने बारे में डर है तो बस तेरा। इसलिये के तू ही इसका सज़ावार है के तुझ से डरा जाए। और तू ही इसका अहल है के बख़्शिश व आमरज़िश से काम ले, तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी हाजत बर ला और मेरी मुराद पूरी कर। मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे दिल को ख़ौफ़ से मुतमइन कर दे। इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है और यह काम तेरे लिये सहल व आसान है। मेरी दुआ क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 11th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

 ग्यारहवीं दुआ
अन्जाम बख़ैर होने की दुआ
 
ऐ वह ज़ात! जिसकी याद, याद करने वालों के लिये सरमाया-ए-इज़्ज़त, ऐ वह जिसका शुक्र, शुक्रगुज़ारों के लिये वजहे कामरानी, ऐ वह जिसकी फ़रमाबरदारी फ़रमाबरदारों के लिये ज़रियाए नजात है। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और हमारे दिलों को अपनी याद में और हमारी ज़बानों को अपने शुक्रिया में और हमारे आज़ा को अपनी फ़रमानबरदारी में मसरूफ़ रखकर हर याद, हर शुक्रिया और फ़रमाबरदारी से बेनियाज़ कर दे।
 
और अगर तूने हमारी मसरूफ़ियतों में कोई फ़राग़त का लम्हा रखा है तो उसे सलामती से हमकिनार कर, इस तरह के नतीजे में कोई गुनाह दामनगीर न हो और ख़स्तगी रूनुमा हो ताके बुराइयों को लिखने वाले फ़रिश्ते इस तरह पलटें के नामाए आमाल हमारी बुराईयों के ज़िक्र से ख़ाली हों और नेकियों को लिखने वाले फ़रिश्ते हमारी नेकियों को लिख कर मसरूर व शादाँ वापस होँ और जब हमारी ज़िन्दगी के दिन बीत जाएं और सिलसिलए हयात क़ता हो जाएं और तेरी बारगाह में हाज़िर होने का बुलावा आए, जिसे बहरहाल आना और जिस पर बहरसूरत लब्बैक कहना है।
 
तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे कातिबाने आमाल हमारे जिन आमाल का शुमार करें उनमें आखि़री अमल मक़बूले तौबा को क़रार दे के इसके बाद हमारे इन गुनाहों और हमारी इन मासियतों पर जिन के हम मुरतकिब हुए हैं सरज़न्श न करे और जब अपने बन्दों के हालात जांचे तो उस पर्दे को जो तूने हमारे गुनाहों पर डाला है सब के रू-ब-रू चाक न करे, बेशक जो तुझे बुलाए तू उस पर मेहरबानी करता है और जो तुझे पुकारे तू उसकी सुनता है।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 10th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

 दसवीं दुआ
अल्लाह तआला से पनाह तलब करने के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ 
बारे इलाहा! अगर तू चाहे के हमें माफ़ कर दे तो यह तेरे फ़ज़्ल के सबब से है और अगर तू चाहे के हमें सज़ा दे तो यह तेरे अद्ल की रू से है। तू अपने शेवए एहसान के पेशे नज़र हमें पूरी माफ़ी दे और हमारे गुनाहों से दरगुज़र करके अपने अज़ाब से बचा ले। इसलिये के हमें तेरे अद्ल की ताब नहीं है और तेरे अफ़ो के बग़ैर हम में से किसी एक की भी निजात नहीं हो सकती।
ऐ बे नियाज़ों के बे नियाज़! हाँ तो फिर हम सब तेरे बन्दे हैं जो तेरे हुज़ूर खड़े हैं। और मैं सब मोहताजों से बढ़ कर तेरा मोहताज हूँ। लेहाज़ा अपने भरे ख़ज़ाने से हमारे दामने फ़क्ऱ व एहतियाज को भर दे, और अपने दरवाज़े से रद्द करके हमारी उम्मीदों को क़तअ न कर, वरना जो तुझसे ख़ुशहाली का तालिब था वह तेरे हाँ से हरमाँनसीब होगा और जो तेरे फ़ज़्ल से बख़्शिश व अता का ख़्वास्तगार था वह तेरे दर से महरूम रहेगा।
तो अब हम तुझे छोड़कर किसके पास जाएँ और तेरा दर छोड़कर किधर का रूख़ करें। तू इससे मुनज़्ज़ा है (के हमें ठुकरा दे जबके) हम ही वह आजिज़ व बेबस हैं जिनकी दुआएं क़ुबूल करना तूने अपने ऊपर लाज़िम कर लिया है और वह दर्दमन्द हैं जिनके दुख दूर करने का तूने वादा किया है, और तमाम चीज़ों में तेरे मक़तज़ाए मशीयत के मनासिब और तमाम उमूर में तेरी बुज़ुर्गी व अज़मत के शायान यह है के तुझसे रहम की दरख़्वास्त करे तू उस पर रहम फ़रमाए और जो तुझसे फ़रयादरसी चाहे तू उसकी फ़रयाद रसी करे। तू अब अपनी बारगाह में हमारी तज़र्रूअ वज़ारी पर रहम फ़रमा। और जबके हमने अपने को तेरे आगे (ख़ाके मुज़ल्लत पर) डाल दिया है तो हमें (फ़िक्र व ग़म से) निजात दे।
बारे इलाहा! जब हमने तेरी मासीयत में शैतान की पैरवी की तो उसने (हमारी इस कमज़ोरी पर)  इज़हारे मसर्रत किया। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आले (अ0) अतहर पर दुरूद भेज। और जब हमने तेरी ख़ातिर उसे छोड़ दिया और उससे रूगर्दानी करके तुझसे लौ लगा चुके हैं तो कोई ऐसी उफ़ताद न पड़े के वह हम पर शमातत करे।’’

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 9th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.

दुआ-9
तलबे मग़फ़ेरत के इश्तियाक़ में हज़रत (अ0) की दुआ
ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और हमारी ताज्जो उस तौबा की तरफ़ मबज़ूल कर दे जो तुझे पसन्द है और गुनाह के इसरार से हमें दूर रख जो तुझे नापसन्द है। बारे इलाहा! जब हमारा मौक़ूफ़ कुछ ऐसा हो के (हमारी किसी कोताही के बाएस) दीन का ज़याल होता हो या दुनिया का तू नुक़सान (दुनिया में) क़रार दे के जो जल्द फ़ना पज़ीद है आर अफ़ो व दरगुज़र को (दीन के मामले में) क़रार दे जो बाक़ी व बरक़रार रहने वाला है और जब हम ऐसे दो कामों का इरादा करें के इनमें से एक तेरी ख़ुशनूदी का और दूसरा तेरी नाराज़ी का बाएस हो तो हमें उस काम की तरफ़ माएल करना जो तुझे ख़ुश करने वाला हो और उस काम से हमें बे दस्त-व-पा कर देना जो तुझे नाराज़ करने वाला हो। और इस मरहले पर हमें इख़्तेयार देकर आज़ाद न छोड़ दे, क्योंकर नफ़्स तो बातिल ही को एख़्तेयार करने वाला है, मगर जहाँ तेरी तौफ़ीक़ शामिले हाल हो और बुराई का हुक्म देने वाला है मगर जहाँ तेरा रहम कारफ़रमा हो। 
बारे इलाहा! तूने हमें कमज़ोर और सुस्त बुनियाद पैदा किया है और पानी के एक हक़ीर क़तरे (नुत्फे) से ख़ल्क़ फ़रमाया है, अगर हमें कुछ वक़्त व तसर्रूफ़ हासिल है तो तेरी क़ूवत की बदौलत, और इख़्तेयार है तो तो तेरी मदद के सहारे से, लेहाज़ा अपनी तौफ़ीक़ से हमारी दस्तगीरी फ़रमा और अपनी रहनुमाई से इस्तेहकाम व क़ूवत बख़्श और हमारे वीदाए दिल को उन बातों से जो तेरी मोहब्बत के खि़लाफ़ हैं नाबीना कर दे और हमारे आज़ा के किसी हिस्से में मासियत के सरायत करने की गुन्जाइश पैदा न कर। बारे इलाहा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर और हमारे दिल के ख़यालों, आज़ा की जुम्बिशों, आँख के इशारों और ज़बान के कलमों को उन चीज़ों में सर्फ़ करने की तौफ़ीक़ दे जो तेरे सवाब का बाएस होँ यहाँ तक के हमसे कोई ऐसी नेकी छूटने न पाये जिससे हम तेरे अज्र व सवाब के मुस्तहक़ क़रार पाएँ और न हम में कोई बुराई रह जाए जिससे तेरे अज़ाब के सज़ावार ठहरें।