Thursday, 20 September 2012

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 68th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 अढ़सठवीं (68) दुआ
दुआए रोज़े शम्बा

 
मदद अल्लाह तआला के नाम से जो हिफ़ाज़त चाहने वालों का कलमए कलाम और पनाह ढूंढने वालों का विर्दे ज़बान है और ख़ुदावन्दे आलम से पनाह चाहता हूं। सितमगारों की सितमरानी, हासिदरों की फ़रेबकारी और ज़ालिमों के ज़ुल्मे नादवा से। मैं उसकी हम्द करता हूं (और सवाल करता हूं के वह इस हम्द को) तमाम हम्द करने वालों की हम्द पर फ़ौक़ियत दे,
 
बारे इलाहा! तू एक अकेला है। जिसका कोई शरीक नहीं है और बग़ैर किसी मालिक के बनाए, तू मालिक व फ़रमानरवा है, तेरे हुक्म के आगे कोई रोक खड़ी नहीं की जा सकती और न तेरी सल्तनत व फ़रमानरवाई में तुझ से टक्कर ली जा सकती है। मैं तुझसे सवाल करता हूं के तू अपने अब्दे ख़ास और रसूल (स0) हज़रत मोहम्मद (स0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी नेमतों पर ऐसा शुक्र मेरे दिल में डाल दे जिससे तू अपनी ख़ुशनूदी की आखि़री हद तक मुझ पहुंचा दे और अपनी नज़रे इनायत से इताअत, इबादत की पाबन्दी और सवाब का इस्तेहक़ाक़ हासिल करने में मेरे मदद फ़रमाए और जब तक मुझे ज़िन्दा रखे, गुनाहों से बाज़ रखने में मुझ पर रहम करे, और जब तक मुझे बाक़ी रखे इन चीज़ों की तौफ़ीक़ दे जो मेरे लिये सूदमन्द हों और अपनी किताब के ज़रिये मेरा सीना खोल दे और उसकी तिलावत के वसीले से मेरे गुनाह छांट दे और जान व ईमान की सलामती अता फ़रमाए और मेरे दोस्तों को (मेरे गुनाहों के बाएस) वहशत में न डाले और जिस तरह मेरी गुज़िश्ता ज़िन्दगी में एहसानात किये हैं उसी तरह बक़िया ज़िन्दगी में मुझ पर अपने एहसानात किये हैं उसी तरह बक़िया ज़िन्दगी में मुझ पर अपने एहसानात की तकमील फ़रमाए। ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 67th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 सढ़सठवीं (67) दुआ
दुआए रोज़े जुमा

 
तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये है जो पैदा करने और ज़िन्दगी बख़्शने से पहले मौजूद था और तमाम चीज़ों के फ़ना होने के बाद बाक़ी रहेगा। वह ऐसा इल्म वाला है के जो उसे याद रखे उसे भूलता नहीं, जो उसका शुक्र अदा करे उसके हाँ कमी नहीं होने देता, जो उसे पुकारे उसे महरूम नहीं करता, जो उससे उम्मीद रखे उसकी उम्मीद नहीं तोड़ता।
 
बारे इलाहा! मैं तुझे गवाह करता हूं और तू गवाह होने के लेहाज़ से बहुत काफ़ी है, और तेरे तमाम फ़रिश्तों और तेरे आसमानों में बसने वालों और तेरे अर्श के उठाने वालों और तेरे फ़र्सतादा नबियों (अ0) और रसूलों (अ0) और तेरी पैदा की हुई क़िस्म-क़िस्म की मख़लूक़ात को अपनी गवाही पर गवाह करता हूं के तू ही माबूद है और तेरे अलावा कोई माबूद नहीं। तू वहदहू लाशरीक है, तेरा कोई हमसर नहीं है तेरे क़ौल में न वादाखि़लाफ़ी होती है और न कोई तबदीली। और यह के मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम तेरे ख़ास बन्दे और रसूल (स0) हैं जिन चीज़ों की ज़िम्मेदारी तूने उन पर आएद की वह बन्दों तक पहुंचा दीं। उन्होंने ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर की राह में जेहाद करके हक़क़े जेहाद अदा किया और सही-सही सवाब की ख़ुशख़बरी दी और वाक़ेई अज़ाब से डराया। बारे इलाहा! जब तक तू मुझे ज़िन्दा रखे अपने दीन पर साबित क़दम रख और जब के तूने मुझे हिदायत कर दी तो मेरे दिल को बेराह न होने दे और मुझे अपने पास से रहमत अता कर। बेशक तू ही नेमतों का बख़्शने वाला है। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उनके इत्तेबाअ और उनकी जमाअत में से क़रार दे और उनके गिर्दा में महशूर फ़रमा और नमाज़े जुमा के फ़रीज़े और उस दिन की दूसरों इबादतों के बजा लाने और फ़राएज़ पर अमल करने वालों पर क़यामत के दिन जो अताएं तूने तक़सीम की हैं उन्हें हासिल करने की तौफ़ीक़ मरहमत फ़रमा। बेशक तू साहेबे इक़्तेदार और हिकमत वाला है।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 66th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 छार्छठवीं (66) दुआ
दुआए रोज़े पंज शंबा
 


सब तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसने अपनी क़ुदरत से अन्धेरी रात को रूख़सत किया और अपनी रहमत से रौशन दिन निकाला और उसकी रौशनी का ज़रतार जामा मुझे पहनाया और उसकी नेमत से बहरामन्द किया। बारे इलाहा! जिस तरह तूने इस दिन के लिये मुझे बाक़ी रखा इसी तरह इस जैसे दूसरे दिनों के लिये ज़िन्दा रख और अपने पैग़म्बर मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस दिन में और इसके अलावा और रातों और दिनों में हराम उमूर के बजा लाने और गुनाह व मआसी के इरतेकाब करने से रन्जीदा ख़ातिर न कर और मुझे इस दिन की भलाई और जो इसके बाद है उसकी भलाई अता कर और इस दिन की बुराई और जो कुछ इस दिन में है उसकी बुराई और जो इसके बाद है उसकी बुराई मुझसे दूर कर दे। ऐ अल्लाह! मैं सलाम के अहद व पैमान के ज़रिये तुझसे तवस्सुल चाहता हूं और क़ुरान की इज़्ज़त व हुरमत के वास्ते तुझ पर भरोसा करता हूं अैर मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के वसीले के तेरी बारगाह में शिफ़ाअत का तलबगार हूं।
 
तो ऐ मेरे माबूद! मेरे इस अहद व पैमान पर नज़र कर जिसके वसीले से हाजत बर आरी का उम्मीदवार हूं। ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले। बारे इलाहा! इस रोज़े पन्जशम्बा में मेरी पांच हाजतें बर ला जिनकी समाई तेरे ही दामने करम में है और तेरी ही नेमतों की फ़रावानी उनकी मुतहम्मिल हो सकती है। ऐसी सलामती दे जिससे तेरी फ़रमानबरदारी की क़ूवत हासिल कर सकूं। ऐसी तौफ़ीक़े इबादत दे जिससे तेरे सवाबे अज़ीम का मुस्तहेक़ क़रार पाऊं। अैर सरे दस्त रिज़्क़े हलाल की फ़रावानी और ख़ौफ़ व ख़तरे के मवाक़े पर अपने अमन के ज़रिये मुतमइन कर दे और ग़मों और फ़िक्रों के हुजूम से अपनी पनाह में रख। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनसे मेरे तवस्सुल को क़यामत के दिन सिफ़ारिश करने वाला, नफ़ा बख़्शने वाला क़रार दे। बेशक तू रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।

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पैसठवीं दुआ
दुआए रोज़े चहारशम्बा


तमाम तारीफ़ उस तआला के लिये है जिसने रात को पर्दा बनाया और नीन्द को आराम व राहत का ज़रिया और दिन को हरकत व अमल के लिये क़रार दिया। तमाम तारीफ़ तेरे ही लिये है के तूने मुझे मेरी ख़्वाबगाह से ज़िन्दा और सलामत उठाया। और अगर तू चाहता तो उसे दाएमी ख़्वाबगाह बना देता। ऐसी हम्द जो हमेशा हमेशा रहे, जिसका सिलसिला क़ता न हो और न मख़लूक़ उसकी गिनती का शुमार कर सके।

बारे इलाहा! तमाम तारीफ़ तेरे ही लिये है के तूने पैदा किया, तो हर लेहाज़ से दुरूस्त पैदा किया। अन्दाज़ा मुक़र्रर किया और हुक्म नाफ़ि़ज़ किया, मौत दी और ज़िन्दा किया। बीमार डाला और शिफ़ा भी बख़्शी, आफ़ियत दी और मुब्तिला भी किया अैर तू अर्श पर मुतमकिन हुआ और मुल्क पर छा गया। मैं तुझसे दुआ मांगने में उस शख़्स का सा तर्ज़े अमल इख़्तियार करता हूं जिसका वसीला कमज़ोर, चाराए कार ख़त्म और मौत का हंगाम नज़दीक हो। दुनिया में उसकी उम्मीदों का दामन सिमट चुका हो और तेरी रहमत की जानिब उसकी एहतियाज शदीद हो और अपनी कोताहियों की वजह से उसे बड़ी हसरत और उसकी लग्ज़िशों और ख़ताओं की कसरत हो और तेरी बारगाह में सिद्क़े नीयत से उसकी तौबा हो चुकी हो तो अब ख़ातेमुल अम्बियाा मोहम्मद (स0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे मोहम्मद (स0) सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम की शिफ़ाअत नसीब कर और मुझे उनकी हमनशीनी से महरूम न कर। इसलिये के तू तमाम रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है। बारे इलाहा! इस रोज़े चहारशम्बा मेंमेरी चार हाजतें पूरी कर दे। यह के इत्मीनान हो तो तेरी फ़रमाबरदारी में, सुरूर हो तो तेरी इबादत में, ख़्वाहिश हो तो तेरे सवाब की जानिब, और किनाराकशी हो तो उन चीज़ों से जो तेरे दर्दनाक अज़ाब का बाएस हैं। बेशक तू जिस चीज़ के लिये चाहे अपने लुत्फ़ को कार फ़रमा करता है।

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चौसठवीं दुआ
दुआए रोज़े सेशम्बा


सब तारीफ़ अल्लाह के लिये है और वही तारीफ़ का हक़दार और वही इसका मुस्तहेक़ है। ऐसी तारीफ़ जोकसीर व फ़रावां हो और मैं अपने ज़मीर की बुराई से उसके दामन में पनाह मांगता हूं और बेशक नफ़्स बहुत ज़्यादा बुराई पर उभारने वाला है मगर यह के मेरा परवरदिगार रहम करे और मैं अल्लाह ही के ज़रिये इस शैतान के शर व फ़साद से पनाह चाहता हूं जो मेरे लिये गुनाह पर गुनाह बढ़ाता जा रहा है और मैं हर सरकश, बदकार और ज़ालिम बादशाह और चीरादस्त दुश्मन से उसके दामने हिमायत में पनाह गुज़ीन हूं।
बारे इलाहा! मुझे अपने लश्कर में क़रार दे क्योंके तेरा लश्कर ही ग़ालिब व फ़तेहमन्द है और मुझे अपने गिरोह में क़रार दे क्योंके तेरा गिरोह ही हर लेहाज़ से बेहतरी पाने वाला है और मुझे अपने दोस्तों में से क़रार दे क्योंके तेरे दोस्तों को न कोई अन्देशा होता है और न वह अफ़सर्दा व ग़मगीन होते हैं। ऐ अल्लाह! मेरे लिये मेरे दीन को आरास्ता कर दे इसलिये के वह मेरे हर मामले में हिफ़ाज़त का ज़रिया है और मेरी आख़ेरत को भी संवार दे क्योंके वह मेरी मुस्तक़िल मन्ज़िल और दिनी व फ़रोमाया लोगों से (पीछा छुड़ाकर) निकल भागने की जगह है और मेरी ज़िन्दगी को हर नेकी में इज़ाफ़े का बाएस और मेरी मौत को हर रन्ज व तकलीफ़ से राहत व सुकून का ज़रिया क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) जो नबीयों (अ0) के ख़ातम और पैग़म्बरों के सिलसिले के फ़र्दे आखि़र हैं उन पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) और बरगुज़ीदा असहाब पर रहमत नाज़िल फरमा और मुझे इस रोज़े सेशम्बाा में तीन चीज़ें अता फ़रमा। वह यह के मेरे किसी गुनाह को बाक़ी न रहने दे मगर यह के उसे बख़्श दे, और न किसी ग़म को मगर यह के उसे बरतरफ़ कर दे और न किसी दुश्मन को मगर यह के उसे दूर कर दे। बिस्मिल्लाह के वास्ते से जो (अल्लाह तआला के) तमाम नामों में से बेहतर नाम (पर मुश्तमिल) है और अल्लाह तआला के नाम के वास्ते से जो ज़मीन व आसमान का परवरदिगार है, मैं तमाम नापसन्दीदा चीज़ों का दफ़िया चाहता हूं। जिनमें अव्वल दर्जे पर उसकी नाराज़गी है और तमाम पसन्दीदा चीज़ों को समेट लेना चाहता हूं। जिनमें सबसे मुक़द्दम उसकी रज़ामन्दी है ऐ फ़ज़्ल व एहसान के मालिक तू अपनी जानिब से मेरा ख़ातेमा बख़्शिश व मग़फ़ेरत पर फ़रमा।

sahifa-e-kamila--sajjadia-63rd-dua--urdu-tarjuma-in-hindi--by-imam-zainul-abedin-a.s



तिरसठवीं दुआ
दुआए रोज़े दोशम्बा


तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह तआला के लिये हैं के जब उसने ज़मीन व आसमान को ख़ल्क़ फ़रमाया तो किसी को गवाह नहीं बनाया, और जब जानदारों को पैदा किया तो अपना कोई मददगार नहीं ठहराया। उलूहियत में कोई उसका शरीक और वहदत (व इन्फ़ेरादियत से मख़सूस होने) में कोई उसका मआवुन नहीं है। ज़बानें उसकी इन्तिहाए सिफ़ात के बयान करने से गंग और अक़्लें उसकी मारेफ़त की तह तक पहुंचने से आजिज़ हैं। जाबिर व सरकश उसकी हैबत के सामने झुके हुए, चेहरे नक़ाबे ख़शयत ओढ़े हुए और अज़मत वाले उसकी अज़मत के आगे सर अफ़गन्दा हैं। तो बस तेरे ही लिये हम्द व सताइश है पै दर पै, लगातार, मुसलसल, पैहम। और उसके रसूल (स0) पर अल्लाह तआला की अबदी रहमत और दाएम व जावेदानी सलाम हो। बारे इलाहा! मेरे इस दिन के इब्तिदाई हिस्से को सलाह व दुरूस्ती, दरमियानी हिस्से को फ़लाह व बहबूदी और आख़ेरी हिस्से को कामयाबी व कामरानी से हमकिनार क़रार दे। और उस दिन से जिसका पहला हिस्सा ख़ौफ़, दरम्यिानी हिस्सा बेताबी और आखि़री हिस्सा दर्द व अलम लिये हुए, तुझसे पनाह मांगता हूं। बारे इलाहा! हर उस नज़र के लिये जो मैंने मानी हो, हर उस वादे की निस्बत जो मैंने किया हो और हर उस अहद व पैमान की बाबत जो मैंने बान्धा हो फिर किसी एक को भी तेरे लिये पूरा न किया हो। तुझसे अफ़ो व बख़्शिश का ख़्वास्तगार हूं और तेरे बन्दों के उन हुक़ूक़ व मज़ालिम की बाबत जो मुझ पर आयद होते हैं, तुझसे सवाल करता हूं के तेरे बन्दों में से जिस बन्दे का और तेरी कनीज़ों में से जिस कनीज़ का कोई हक़ मुझ पर हो, इस तरह के ख़ुद उसकी ज़ात या उसकी इज़्ज़त या उसके माल या उसके अह्लो औलाद की निस्बत में मज़लेमा का मुरतकिब हुआ हूं या ग़ीबत के ज़रिये उसकी बदगोई की हो या (अपने ज़ाती) रूझान या किसी ख़्वाहिश या रउनत या ख़ुद पसन्दी या रिया, या अस्बेयत से उस पर नाजाएज़ दबाव डाला हो, चाहे वह ग़ाएब हो या हाज़िर, ज़िन्दा हो या मर गया हो, और अब उसका हक़ अदा करना या उससे तहल्लुल मेरे दस्तरस से बाहर और मेरी ताक़त से बाला हो तो ऐ वह जो हाजतों के बर लाने पर क़ादिर है और वह हाजतें उसकी मशीयत के ज़ेरे फ़रमान और उसके इरादे की जानिब तेज़ी से बढ़ती हैं। मैं तुझसे सवाल करता हूं के तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाए और ऐसे शख़्स को जिस तरह तू चाहे मुझसे राज़ी कर दे और मुझे अपने पास से रहमत अता कर। बिला शुबह मग़फ़ेरत व आमरज़िश से तेरे हां कोई कमी नहीं  होती और न बख़्शिश व अता से तुझे कोई नुक़सान पहुंच सकता है। ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले। बारे इलाहा! तू मुझे दोशम्बे के दिन अपनी जानिब से दो नेमतें मरहमत फ़रमा। एक यह के इस दिन के इब्तिदाई हिस्से में तेरी इताअत के ज़रिये सआदत हासिल हो और दूसरे यह के इसके आखि़री हिस्से में तेरी मग़फ़ेरत के बाएस नेमत से बहरामन्द हूं। ऐ व हके वही माबूद है और उसके अलावा कोई गुनाहों की बख़्श नहीं सकता।

sahifa-e-kamila--sajjadia-62nd-dua--urdu-tarjuma-in-hindi--by-imam-zainul-abedin-a.s



बारसठवीं दुआ
हफ़ते के सात दिनों में हज़रत (अ0) के पढ़ने की दुआएं
दुआए रोज़े यकशम्बा


उस अल्लाह के नाम से मदद मांगता हूं जिसके फ़ज़्ल व करम ही का उम्मीदवार हूं और जिसके अद्ल ही से अन्देशा है। उसी की बात पर मुझे भरोसा है और उसी की रस्सी से वाबस्ता हूं। ऐ अफ़ो व ख़ुशनूदी के मालिक! मैं तुझसे ज़ुल्म व जौर, ज़माने के इन्क़ेलाबात, ग़मों के पैहम हुजूम और नाज़िल होने वाली मुसीबतों से पनाह मांगता हूं और इस बात से के आख़ेरत का साज़ व सामान और ज़ादे राह मुहय्या करने से पहले ही मुद्दते हयात ख़त्म हो जाए और तुझ ही से उन चीज़ों की रहनुमाई चाहता हूं जिन में अपनी बहबूदी और दूसरों की फ़लाह व दुरूस्तगी का सामान हो और तुझ ही से मदद मांगता हूं उन बातों की जिनमें अपनी फ़लाह व कामरानी और दूसरे क

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इकसठवीं दुआ
ख़ौफ़ व ख़तरे के मौक़े पर हज़रत (अ0) की दुआ


ऐ मेरे माबूद! तेरे ग़ज़ब को कोई चीज़ रोक नहीं सकती सिवा तेरे हिल्म के, और तेरे अज़ाब से कोई चीज़ छुड़ा नहीं सकती सिवा तेरे अफ़ोव करम के और तुझसे कोई चीज़ बचा नहीं सकती सिवा तेरी रहमत अैर तेरी बारगाह में तज़र्रोअ व ज़ारी के, ऐ मेरे माबूद! तू उस क़ुदरत के ज़रिये जिससे मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दा करेगा और बन्दों की (मुर्दा) रूहों को ज़िन्दगी देगा, मुझे कशाइश् व फ़ारिग़लबाली अताकर और तबाह व बरबाद न होने दे। (मौत से पहले) क़ुबूलियते दुआ से आगाह कर दे। ऐ मेरे परवरदिगाार और मुझे रफ़अत व सरबलन्दी दे और पस्त व नेगोनिसार न कर और मेरी इमदाद फ़रमा और मुझे रोज़ी दे, और आफ़तों से हिफ़्ज़ व अमान में रख। परवरदिगार! अगर तू मुझे बलन्द करे तो फ़िर कौन मुझे पस्त कर सकता है, और अगर तू पस्त करे तो कौन बलन्द कर सकता है। और ऐ मेरे माबूद मुझे बख़ूबी इल्म है के तेरे हुक्म में ज़ुल्म का शाएबा नहीं है और न तेरे इन्तेक़ाम में जल्दी- जल्दी तो वह करता है जिसे मौक़े के हाथ से निकल जाने का अन्देशा होता है और ज़ुल्म करने की ज़रूरत उसे पड़ती है जो कमज़ोर व नातवां होता है और तू ऐ मेरे मालिक! इससे कहीं ज़्यादा बलन्द व बरतर है। ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे बला व मुसीबत का हदफ़ अैर अपने अज़ाब का निशाना न बना, और मुझे मोहलत दे और मेरे ग़म व अन्दोह को दूर कर। मेरी लग्ज़िश से दरगुज़र फ़रमा और मुसीबत मेरे पीछे न लगा। क्योंकेमेरी कमज़ोरी व बेचारगी तेरे सामने है। तू मुझे सब्र व सेबात की हिम्मत दे। क्योंके ऐ मेरे परवरदिगार! मैं कमज़ोर और तेरे आगे गिड़गिड़ाने वाला हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! मैं तुझसे तेरे ही दामने रहमत में पनाह मांगता हूं लेहाज़ा मुझे पनाह दे और हर मुसीबत व इब्तेला से तेरे ही दामन में अमान का तलबगार हूं लेहाज़ा मुझे अमान दे और तुझसे परदापोशी चाहता हूं लेहाज़ा जिन चीज़ों से मैं ख़ौफ़ व हेरास महसूस करता हूं उनसे ऐ मेरे मालिक अपने दामने हिफ़्ज़ व हिमायत में छुपा ले और तू अज़ीम और हर अज़ीम से अज़ीमतर है। मैं तेरे और सिर्फ़ तेरे और महज़ तेरे ज़रिये (पर्दाए हिफ़्ज़ व अमान में) छिप हुआ हूं। ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर रहमत और कसीर सलामती नाज़िल फ़रमा। 

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साठवीं दुआ
कर्ब व मुसीबत से तहफ़्फ़ुज़ और लग़्िज़श व ख़ता से मुआफ़ी के लिये हज़रत (अ0) की दुआ


ऐ मेरे माबूद! मेरे दुश्मनों के मेरी हालत पर दिल में ख़ुश होने का मौक़ा न दे और मेरी वजह से मेरे किसी मुख़लिस व दोस्त को रन्जीदा ख़ातिर न कर। बारे इलाहा! अपनी नज़रे इनायात में से ऐसी नज़रे तवज्जो मेरे शामिले हाल फ़रमा जिससे तू इन मुसीबतों को मुझसे टाल दे जिनमें मुझे मुब्तिला किया है और उन एहसानात की तरफ़ मुझे पलटा दे जिनका मुझे ख़ूगर बनाया है और मेरी दुआ और हर उस शख़्स की दुआ को जो सिद्क़े नीयत से तुझे पुकारे क़ुबूल फ़रमा। क्योंके मेरी क़ूवत कमज़ोर, चाराजोई की सूरत नापैद, और हालत सख़्त से सख़्त तर हो गई है और जो कुछ तेरे मख़लूक़ात के पास है उससे मैं बिलकुल ना उम्मीद हूं। अब तो तेरी पहली नेमतों के दोबारा हासिल होने में तेरी उम्मीद के अलावा कोई सूरत बाक़ी नहीं रही। ऐ मेरे माबूद! जिन रन्ज व आलाम में गिरफ़्तार हूं उनके छुटकारा दिलाने पर तू ऐसा ही क़ादिर है जैसा उन चीज़ों पर क़ुदरत रखता है जिनमें मुझे मुब्तिला किया है। बेशक तेरे एहसानात की याद मेरा दिल बहलाती और तेरे इनआम व तफ़ज़्ज़ुल की उम्मीद मेरी हिम्मत बन्धाती है। इसलिये के जबसे तूने मुझे पैदा किया है मैं तेरी नेमतों से महरूम नहीं रहा। और तू ही मेरे माबूद! मेरी पनाहगाह, मेरा मुलजा, मेरा मुहाफ़िज़ व पुश्त पनाह, मेरे हाल पर शफ़ीक़ व मेहरबान और मेरे रिज़्क़ का ज़िम्मादार है, जो मुसीबत मुझ पर वारिद हुई है वह तेरे फ़ैसलए क़ज़ा व क़द्र में और जो मेरी मौजूदा हालत है वह तेरे इल्म में गुज़र चुकी थी। तो ऐ मेरे मालिम व सरदार! जिन चीज़ों को तेरे फ़ैसलए क़ज़ा व क़द्र ने मेरे हक़ में तै किया और लाज़िम व ज़रूरी क़रार दिया है उन चीज़ों में से मेरी इताअत और वह चीज़ जिससे मेरी बहबूदी और जिस हालत में हूं उस से रिहाई वाबस्ता है क़रार दे। क्योंके मैं इस मुसीबत के टालने में किसी से उम्मीद नहीं रखता और न इस सिलसिले में तेरे अलावा किसी पर भरोसा करता हूं तो ऐ जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक मेरे इस हुस्ने ज़न के मुताबिक़ साबित हो जो मुझे तेरे बारे में है और मेरी कमज़ोरी व बेचारगी पर रहम फ़रमा। मेरी बेचैनी को दूर कर। मेरी दुआ क़ुबूल फ़रमाा। मेरी ख़ता व लग़्िज़श को माफ़ कर दे और मुझ पर और जो कुछ भी तुझसे दुआा मांगे अफ़ो व दरगुज़र करके एहसान फ़रमा। ऐ मेरे मालिक! तूने मुझे दुआ का हुक्म दिया और क़ुबूलियते दुआा का ज़िम्मा लिया, और तेरा वादा ऐसा सच्चा है जिसमें खि़लाफ़वर्ज़ी व तबदीली की गुन्जाइश नहीं है। तू अपने नबी (स0) और अब्दे ख़ास मोहम्मद (स0) और उनके अहले बैते अतहार (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। और मेरी  फ़रयाद को पहुंच क्योंके तू उनका फ़रयादरस है जिनका कोई फ़रयादरस न हो। और उनके लिये पनाह है जिनके लिये कोई पनाह न हो। मैं ही वह मुज़तर व लाचार हूं जिसकी दुआ क़ुबूल करने और उसके दुख दर्द दूर करने का तूने इलतेज़ाम किया है। लेहाज़ा मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा, मेरे ग़म को दूर और मेरे रन्ज व अन्दोह को बरतरफ़ फ़रमा और मेरी हालत को पहली हालत से भी बेहतर हालत की तरफ़ पलटा दे और मुझे इस्तेहक़ाक़ के बक़द्र अज्र न दे बल्कि अपनी उस रहमत के लेहाज़ से जज़ा दे जो तमाम चीज़ों पर छाई हुई है। ऐ जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स0) और आले मोहम्मद (स0) पर और मेरी दुआ को सुन और उसे क़ुबूल फ़रमा। ऐ ग़ालिब! ऐ साहेबे इक़्तेदार।

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उनसठवीं दुआ
हज़रते आदम (अ0) पर दुरूदो सलवात के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ


बारे इलाहा! वह आदम (अ0) जो तेरी आफ़ज़ीन्श के नक़्शे बदीअ और ख़ाक से पैदा होने वालों में तेरी रुबूबीयत के पहले मोतरफ़ और तेरे बन्दों और तेरी मख़लूक़ात पर तेरी पहली हुज्जत और तेरे अज़ाब से तेरे दामने अफ़ो में पनाह मांगने की राह दिखाने वाले और तेरी बारगाह में तौबा की राहें आश्कारा करने वाले और तेरी मारेफ़त और तेरे मख़लूक़ात के दरमियान वसीला बनने वाले हैं। व हके जिन पर ख़ुसूसी करम व एहसान और मेहरबानी करते हुए उन्हें वह तमाम बातें बतला दीं जिनके ज़रिये तू उनसे राज़ी व ख़ुशनूद हुआ व हके जो तौबा व अनाबत करने वाले हैं। जिन्होंने तेरी मासियत पर इसरार नहीं किया। जो तेरे हरम में सर मुन्डवा कर अज्ज़ व फ़रवतनी करने वालों में साबिक़ हैं। वह जो मुख़ालेफ़त के बाद इताअत के वसीले से तेरे अफ़ो व करमम के ख़्वाहिशमन्द हुए और उन तमाम अम्बिया के बाप हैं जिन्होंने तेरी राह में अज़ीयतें उठाईं। और ज़मीन पर बसने वालों में सबसे ज़्यादा तेरी इताअत व बन्दगी में सई व कोशिश करने वाले हैं। उन पर ऐ मेहरबानी करने वाले तू अपनी जानिब से और अपने फ़रिश्तों और ज़मीन व आसमान में बसने वालों की तरफ़ से रहमत नाज़िल फ़रमा। जिस तरह उन्होंने तेरी क़ाबिले एहतेराम चीज़ों की अज़मत मलहूज रखी और तेरी ख़ुशनूदी व रज़ामन्दी की तरफ़ हमारी रहनुमाई की। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

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अट्ठावनवीं दुआ
हज़रत (अ0) की दुआ जो ज़िक्रे आले मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम) पर मुश्तमिल है


ऐ अल्लाह! ऐ वह जिसने मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) को इज़्ज़त व बुज़ुर्गी के साथ मख़सूस किया और जिन्हें मन्सबे रिसालत अता किया और वसीला बनाकर इम्तियाज़े ख़ास बख़्शा। जिन्हें अम्बिया का वारिस क़रार दिया और जिनके ज़रिये औसिया और आइम्मा का सिलसिला ख़त्म किया। जिन्हें गुज़िश्ता व आइन्दा का इल्म सिखया और लोगों के दिलों को जिनकी तरफ़ माएल किया। बारे इलाहा! मोहम्मद (स0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे साथ दीन, दुनिया और आख़ेरत में वह बरताव कर जिसका तू सज़ावार है। यक़ीनन तू हर चीज़ पर क़ादिर है।

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सत्तावनवीं दुआ
तज़ल्लुल व आजेज़ी के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ


ऐ मेरे आक़ा ऐ मेरे मालिक! तू आक़ा है, और मैं बन्दा, और बन्दे पर आक़ा के सिवा कौन रहम खाएगा। मेरे मौला, मेरे आक़ा! तू इज़्ज़त वाला है और मैं ज़लील और ज़लील पर इज़्ज़तदार के अलावा और कौन रहम करेगा। मेरे मालिक, मेरे मालिक! तू ख़ालिक़ है और मैं मख़लूक़ और मख़लूक़ पर ख़ालिक़ के सिवा कौन तरस खाएगा। मेरे मौला! मेरे मौला! तू अता करने वाला है और मैं सवाली और साएल पर अता करने वाले के अलावा कौन मेहरबानी करेगा। मेरे आक़ा! मेरे आक़ा तू फ़रयाद रस है और मैं फ़रियादी और फ़रियादी पर फ़रयादरस के अलावा कौन रहम करेगा। मेरे मालिक! मेरे मालिक! तू बाक़ी है और मैं फ़ानी और फ़ानी पर दाएम व जावेद के अलावा कौन रहम करेगा। मेरे मौला! मेरे मौला! तू ज़िन्दा है और मैं मुर्दा और मुर्दा पर ज़िन्दा के सिवा कौन तरस खाएगा। मेरे मालिक मेरे मालिक! तू ताक़तवर है है और मैं कमज़ोर और कमज़ोर पर ताक़तवर के अलावा कौन रहम करेगा। मेरे मौला! मेरे मालिक! तू ग़नी है और मैं तही दस्त। और तही दस्त पर ग़नी के अलावा कौन रहम खाएगा। मेरे आक़ा! मेरे आक़ा! तू बड़ा है और मैं छोटा और छोटे पर बड़े के सिवा कौन नज़रे शफ़क़्क़त करेगा। मेरे मौला! मेरे मौला! तू मालिक है और मैं ग़ुलाम और ग़ुलाम पर मालिक के सिवा कौन मेहरबानी करेगा।
 

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छप्पनवीं दुआ
बुज़ुर्गी व अज़मते इलाही के बयान में हज़रत (अ0) की दुआ


तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये हैं जो अपनी अज़मत के साथ दिलों पर रोशन व दरख़शां है और अपनी इज़्ज़त के साथ आंखों से पिनहां है। और तमाम चीज़ों पर अपने इक़्तेदार से क़ाबू रखता है। न आंखें उसके दीदार की ताब ला सकती हैं और न अक़्लें उसकी अज़मत की हद तक पहुंच सकती हैं। वह अपनी अज़मत व बुज़ुर्गी के साथ हर चीज़ पर ग़ालिब है और इज़्ज़त व एहसान व जलालत की रिदा ओढ़े हूए है हुस्न व जमाल के साथ नक़ाएस से बुरी है और फ़ख़्रव सरबलन्दी के साथ शरफ़ व बुज़ुर्गी का मालिक है और ख़ैर व बख़्शिश की फ़रावानी और (अताए) नेमात से ख़ुश होता है और नूर व रोशनी के साथ (तमाम आलम से) इम्तियाज़ रखता है। वह ऐसा ख़ालिक़ है जिससका कोई नज़ीर नहीं। वह ऐसा यकता है जिसका कोई मिस्ल नहीं। वह ऐसा यगाना है जिसका कोई मद्दे मुक़ाबिल नहीं। वह ऐसा बेनियाज़ है जिसका कोई हमसर नहीं। वह ख़ुदा जिसका कोई दूसरा नहीं। वह पैदा करने वाला है जिसका कोई शरीकेकार नहीं। वह रिज़्क़ देने वाला है जिसका कोई मददगार नहीं। वह ऐसा अव्वल है जिसे ज़वाल नहीं। वह ऐसा बाक़ी व जावेद है जिसे फ़ना नहीं। वह दाएम व क़ायम है बग़ैर किसी रन्ज व मशक़्क़त के वह अम्न व अमान का बख़्शने वाला है। बगै़र किसी  हद व निहायत के वह ईजाद करने वाला है। बगै़र किसी मुद्दत की हदबन्दी के वह सानेअ व मौजूद है। बगै़र किसी एक (की एआनत) के वह परवरदिगार है । बगै़र किसी  शरीक के वह पैदा करने वाला है । बगै़र किसी ज़हमत व दुश्वारी के वह काम करने वाला है। बग़ैर अज्ज़ व दरमान्दगी के उसकी कोई हद नहीं। मकान में और न उसकी कोई इन्तेहा है ज़माने में। वह हमेशा से है, हमेशा रहेगा। यूंही हमेशा हमेशा उसे कभी ज़वाल न होगा। वही ख़ुदा है जो ज़िन्दा व क़ायम व दायम, क़दीम क़ादिर और इल्म व हिकमत वाला है। बारे इलाहा! तेरा एक बन्दाए हक़ीर तेरे साहते क़ुद्स में हाज़िर है। तेरा साएल तेरे आस्ताने पर हाज़िर है। तेरा मोहताज व दस्तंगर तेरी बारगाह में हाज़िर है (इन तीनों जुमलों को तीन मरतबा दोहराए) ऐ मेरे अल्लाह (ज0) तुझ ही से इबादतगुज़ार डरते हैं और तेरे ख़ौफ़ और उम्मीद व अफ़ो व बख़्शिश के पेशे नज़र आजिज़ी से इल्तिजा करने वाले तुझसे लौ लगाते हैं। ऐ सच्चे माबूद! इस्तेग़ासा व फ़रयाद करने वालों की पुकार पर रहम फ़रमा और ग़फ़लत में गिरफ़्तार होने वालों के गुनाहों से दरगुज़र फ़रमा और ऐ करीम अपनी बारगाह में तौबा करने वालों के साथ उस दिन के ज बवह तेरे सामने पेश हों, नेकी और एहसान में इज़ाफ़ा फ़रमा।

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पचपनवीं दुआ
यह वह दुआएं हैं जो सहीफ़ाए कामेला के बाज़ नुस्ख़ों में दर्ज की गई हैं- मिनजुमला उनके हज़रत (अ0) की एक दुआ यह है जो तस्बीह व तक़दीस के सिलसिले में


ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी तस्बीह करता हूं तू मुझ पर करम बालाए करम फ़रमा। बारे इलाहा! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और तू बलन्द व बरतर है। ख़ुदाया! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और इज़्ज़त तेरा ही जामअ है। बारे इलाहा! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और अज़मत तेरी ही रिदा है। ऐ परवरदिगार! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और किबरियाई तेरी दलील व हुज्जत है, पाक है तू ऐ अज़ीम व बरबर तू कितना अज़मत वाला है। पाक है तू ऐ वह के मलाए आला के रहने वालों में तेरी तस्बीह की गयी है जो कुछ तहे ख़ाक है तू उसे सुनता और देखता है। पाक है तेरी ज़ात तू हर राज़दाराना गुफ़्तगू पर मुतलअ है। पाक है तू ऐ वह जो हर रन्ज व शिकवा के पेश करने की जगह है। पाक है तू ऐ वह जो हर इज्तेमाअ में मौजूद है। पाक है तू ऐ वह जिससे बड़ी  से बड़ी उम्मीदें बान्धी जाती हैं। पाक है तू जो कुछ पानी की गहराई में है उसे तू देखता है। पाक है तेरी ज़ात तू समन्दरों की गहराइयों में मछलियों के सांस लेने की आवाज़ सुनता है। पाक है तेरी ज़ात तू आसमानों का वज़न जानता है, पाक है तेरी ज़ात तू ज़मीनों के वज़न से बाख़बर है। पाक है तेरी ज़ात तू सूरज और चान्द के वज़न से वाक़िफ़ है। पाक है तेरी ज़ात तू तारीकी और रोशनी के वज़न से आगाह है पाक है तेरी ज़ात तू साया और हवा का वज़न जानता है। पाक है तेरी ज़ात तू हवा के (हर झोंके के) वज़न से आगाह है के वह वज़न में कितने ज़र्रों के बराबर है। पाक है तेरी ज़ात तू (तसव्वुर व ख़याल व वहम में आने से) पाक, मुनज़्ज़ह और बरी है मैं तेरी तस्बीह करता हूं। ताज्जुब है के जिसने तुझे पहचाना वह क्योंकर तुझसे ख़ौफ़ नहीं खाता। ऐ अल्लाह! मैं हम्द व सना के साथ तेरी पाकीज़गी बयान करता हूं। पाक है वह परवरदिगार जो उलू व अज़मत वाला है।

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चौवनवीं दुआ
ग़म व अन्दोह से निजात हासिल करने के लिये हज़रत (अ0) की दुआ


इस रन्ज व अन्दोह के बरतरफ़ करने वाले और ग़म व अलम के दूर करने वाले, ऐ दुनिया व आख़ेरत में रहम करने वाले और दोनों जहानों में मेहरबानी फ़रमाने वाले तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी बेचैनी को दूर और मेरे ग़म को बरतरफ़ कर दे ऐ अकेले, ऐ यकता! ऐ बेनियाज़! ऐ वह जिसकी कोई औलाद नहीं और न वह किसी की औलाद है और न उसका कोई हमसर है मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा और मुझे (गुनाहों से) पाक रख और मेरे रन्ज व अलम को दूर कर दे (इस मुक़ाम पर आयतलकुर्सी, क़ुल आउज़ो बेरब्बिन्नास, क़ुल आउज़ो बेरब्बिल फ़लक़ और क़ुल हो वल्लाहो अहद पढ़ो और यह कहो) बारे इलाहा! मैं तुझसे सवाल करता हूं, उस शख़्स का सवाल जिसकी एहतियाज शदीद क़ूवत व तवानाई ज़ईफ़ और गुनाह फ़रावां हों, उस शख़्स का सा सवाल जिसे अपनी हाजत के मौक़े पर कोई फ़रयादरस, जिसे अपनी कमज़ोरी के आलम में कोई पुश्तपनाह और जिसे तेरे अलावा ऐ जलालत व बुज़ुर्गी वाले। कोई गुनाहों का बख़्शने वाला दस्तयाब न हो। बारे इलाहा! मैं तुझसे इस अमल (की तौफ़ीक़) का सवाल करता हूं के जो उस पर अमलपैरा हो तू उसे दोस्त रखे और ऐसे यक़ीन का के जो उसके ज़रिये तेरे फ़रमाने क़ज़ा पर पूरी तरह मुतयक़्क़न हो तो उसके बाएस तू फ़ाएदा व मनफ़अत पहुंचाए। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे हक़ व सेदाक़त पर मौत दे और दुनिया से मेरी हाजत व ज़रूरत का सिलसिला ख़त्म कर दे और अपनी मुलाक़ात के जज़्बए इश्तियाक़ की बिना पर अपने हां की चीज़ों की तरफ़ मेरी ख़्वाहिश व रग़बत क़रार दे और मुझे अपनी ज़ात पर सही एतमाद व तवक्कल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। मैं तुझसे साबेक़ा नौश्ते तक़दीर की भलाई का तालिब हूं और साबेक़ा सरनौश्ते तक़दीर की बुराई से पनाह मांगता हूं। मैं तेरे इबादतगुज़ार बन्दों के ख़ौफ़, अज्ज़ व फ़रवतनी करने वालों की इबादत, तवक्कल करने वालों के यक़ीन और ईमानदारों के एतमाद व तवक्कल का तुझसे ख़्वास्तगार हूं। बारे इलाहा! तलब व सवाल में मेरी ख़्वाहिश व रग़बत को ऐसा ही क़रार दे जैसी तलब व सवाल मैं तेरे दोस्तों की तमन्ना व ख़्वाहिश होती है। और मेरे ख़ौफ़ को भी अपनी दोस्तों के ख़ौफ़ के मानिन्द ंक़रार दे और मुझे अपनी रेज़ा व ख़ुशनूदी में इस तरह बरसरे ंअमल रख के मैं तेरे मख़लूक़ात में से किसी एक के ख़ौफ़ से तेरे दीन की किसी बात को तर्क न करूं। ऐ अल्लाह! यह मेरी हाजत है इसमें मेरी तवज्जो व रग़बत को अज़ीम कर दे। मेरे उज़्र को आश्कारा कर और उसके बारे में मुझे दलील व हुज्जत की तालीम कर और इसमें मेरे जिस्म को सेहत व सलामती बख़्श। ऐ अल्लाह! जिसे भी तेरे सिवा दूसरे पर भरोसा या उम्मीद हो तो मैं इस आलम में सुबह करता हूं के तमाम उमूर में तू ही एतमाद व उम्मीद का मरकज़ होता है। लेहाज़ा जो उमूर बलेहाज़ अन्जाम बेहतर हों वह मेरे लिये नाफ़िज़ फ़रमा और मुझे अपनी रहमत के वसीले से गुमराह करने वाले फ़ित्नों से छुटकारा दे। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले। और अल्लाह रहमत नाज़िल करे हमारे सययद व सरदार फ़र्सतादहे ख़ुदा मोहम्मद (स0) मुस्तफ़ा पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ0) पर।

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तिरपनवीं दुआ
अल्लाह तआला के हुज़ूर तज़ल्लुल व आजिज़ी के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ


ऐ मेरे परवरदिगार! मेरे गुनाहों ने मुझे (उज़्र ख़्वाही से) चुप कर दिया है, मेरी गुफ़्तगू भी दम तोड़ चुकी है। तो अब मैं कोई उज़्र व हुज्जत नहीं रखता। इस तरह मैं अपने रन्ज व मुसीबत में गिरफ़्तार अपने आमाल के हाथों में गिरवी अपने गुनाहों में हैरान व परेशान, मक़सद से सरगर्दान और मन्ज़िल से दूर उफ़तादा हूँ। मैंने अपने के ज़लील गुनहगारों के मौक़ुफ़ पर ला खड़ा किया है। इन बदबख़्तों के मौक़ुफ़ पर जो तेरे मुक़ाबले में जराएत दिखाने वाले और तेरे वादे को सरसरी समझने वाले हैं, पाक है तेरी ज़ात। मैंने किस जराअत व दिलेरी के साथ तेरे मुक़ाबले में जराअत की है और किस तबाही व बरबादी के साथ अपनी हलाकत का सामान किया है। ऐ मेरे मालिक, मेरे मुंह के बल गिरने और क़दमों के ठोकर खाने पर रहम फ़रमा और अपने हिल्म से मेरी जेहालत व नादानी को और अपने एहसान से मेरी ख़ता व बदआमाली को बख़्श दे इसलिये के मैं अपने गुनाहों का मोक़िर और अपनी ख़ताओं का मोतरफ़ हूं यह मेरा हाथ और यह मेरी पेशानी के बाल (तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में) हैं। मैंने अज्ज़ व सराफ़गन्दगी के साथ अपने को क़ेसास के लिये पेश कर दिया है। बारे इलाहा! मेरे बुढ़ापे, ज़िन्दगी के दिनों के बीत जाने, मौत के सर पर मण्डलाने और मेरी नातवान, आजिज़ी और बेचारगी पर रहम फ़रमा। ऐ मेरे मालिक, जब दुनिया से मेरा नाम व निशान मिट जाए और लोगों (के दिलों) से मेरी याद महो हो जाए और उन लोगों की तरह जिन्हें भुला दिया जाता है मैं भी भुला दिये जाने वालों में से हो जाऊं तो मुझ पर रहम फ़रमाना। ऐ मेरे मालिक! मेरी सूरत व हालत के बदल जाने के वक़्त जब मेरा जिस्म कोहनहू आज़ा दरहम बरहम और जोड़ व बन्द अलग अलग हो जाएं तो मुझ पर तरस खाना। हाए मेरी ग़फ़लत व बेख़बरी उससे जो अब मेरे लिये चाहा जा रहा है और ऐ मेरे मौला! हश्र व नशरत के हंगाम मुझ पर रहम करना और उस दिन मेरा क़याम अपने दोस्तों के साथ और (मौक़फ़े हिसाब से महले जज़ा की तरफ़) मेरी वापसी अपने दोस्तदारों के हमराह और मेरी मन्ज़िल अपनी हमसायगी में क़रार देना। ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार।

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बावनवीं दुआ
अल्लाह तआला से तलब व इलहाह के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ


ऐ वह माबूद जिससे केई चीज़ पोशीदा नहीं है चाहे ज़मीन में हो चाहे आसमान में। और ऐ मेरे माबूद वह चीज़ें जिन्हें तूने पैदा किया है वह तुझसे क्योंकर पोशीदा रह सकती हैं। और जिन चीज़ों को तूने बनाया है उन पर किस तरह तेरा इल्म मोहीत न होगा और जिन चीज़ों की तू तदबीर व कारसाज़ी करता है वह तेरी नज़रों से किस तरह ओझल रह सकती हैं और जिसकी ज़िन्दगी तेरे रिज़्क़ से वाबस्ता हो वह तुझसे क्योंकर राहे गुरेज़ इख़्तेयार कर सकता है या जिसे तेरे मुल्क के अलावा कहीं रास्ता न मिले वह किस तरह तुझसे आज़ाद हो सकता है। पाक है तू, जो तुझे ज़्यादा जानने वाला है वोही सब मख़लूक़ात से ज़्यादा तुझसे डरने वाला है और जो तेरे सामने सरअफ़गन्दह है वही सबसे ज़्यादा तेरे फ़रमान पर कारबन्द है और तेरी नज़रों में सबसे ज़्यादा ज़लील व ख़्वार वह है जिसे तू रोज़ी देता है और वह तेरे अलावा दूसरे की परस्तिश करता है। पाक है तू, जो तेरा शरीक ठहराए और तेरे  रसूलों को झुठलाए वह तेरी सल्तनतमें कमी नहीं कर सकता और जो तेरे हुक्मे क़ज़ा व क़द्र को नापसन्द करे वह तेरे फ़रमान को पलटा नहीं सकता। और जो तेरी क़ुदरत का इनकार करे वह तुझसे अपना बचाव नहीं कर सकता और जो तेरे अलावा किसी और की इबादत करे वह तुझसे बच नहीं सकता और जो तेरी मुलाक़ात को नागवार समझे वह दुनिया में ज़िन्दगी जावेद हासिल नहीं कर सकता। पाक है तू, तेरी शान कितनी अज़ीम, तेरा इक़्तेदार कितना ग़ालिब, तेरी क़ूवत कितनी मज़बूत और तेरा फ़रमान कितना नाफ़िज़ है। तू पाक व मुनज़्ज़ह है तूने तमाम ख़ल्क़ के लिये मौत का फ़ैसला किया है। क्या कोई तुझे यकता जाने और क्या कोई तेरा इन्कार करे। सब ही मौत की तल्ख़ी चखने वाले और सब ही तेरी तरफ़ पलटने वाले हैं। तू बा बरकत और बलन्द व बरतर है। कोई माबूद नहीं मगर तू, तू एक अकेला है और तेरा कोई शरीक नहीं है। मैं तुझ पर ईमान लाया हूं, तेरे रसूलों की तस्दीक़ की है। तेरी किताब को माना है, तेरे अलावा हर माबूद का इन्कार किया है और जो तेरे अलावा दूसरे की परस्तिश करे उससे बेज़ारी इख़्तेयार की है। बारे इलाहा! मैं इस आलम में सुबह व शाम करता हूं के अपने आमाल को कम तसव्वुर करता, अपने गुनाहों का एतराफ़ और अपनी ख़ताओं का इक़रार करता हूं, मैं अपने नफ़्स पर ज़ुल्म व ज़्यादती के बाएस ज़लील व ख़्वार हूं। मेरे किरदार ने मुझे हलाक और हवाए नफ़्स ने तबाह कर दिया है और ख़्वाहिशात ने (नेकी व सआदत से) बे बहरा कर दिया है। ऐ मेरे मालिक! मैं तुझसे ऐसे शख़्स की तरह सवाल करता हूं जिसका नफ़्स तूलानी उम्मीदों के बाएस ग़ाफ़िल, जिस्म सेहत व तन आसानी की वजह से बे ख़बर, दिल नेमत की फ़रावानी के सबब ख़्वाहिशों पर वारफ़ता और फ़िक्र अन्जामकार की निस्बत कम हो। मेरा सवाल उस शख़्स के मानिन्द है जिस पर आरज़ूओं ने ग़लबा पा लिया हो। जिसे ख़्वाहिशाते नफ़्स ने वरग़लाया हो, जिस पर दुनिया मुसल्लत हो चुकी हो और जिसके सर पर मौत ने साया डाल दिया हो। मेरा सवाल उस शख़्स के सवाल के मानिन्द है जो अपने गुनाहों को ज़्यादा समझता और अपनी ख़ताओं का एतराफ़ करता हो, मेरा सवाल उस शख़्स का सा सवाल है जिसका तेरे अलावा कोई परवरदिगार और तेरे सिवा कोई वली व सरपरस्त न हो और जिसका तुझसे कोई बचाने वाला और न उसके लिये तुझसे सिवा तेरी तरफ़ रूजू होने के कोई पनाहगाह हो। बारे इलाहा! मैं तेरे उस हक़ के वास्ते से जो तेरे मख़लूक़ात पर लाज़िम व वाजिब है और तेरे उस बुज़ुर्ग नाम के वास्ते से जिसके साथ तूने अपने रसूल (स0) को तस्बीह करने का हुक्म दिया और तेरी उस ज़ाते बुज़ुर्गवार की बुज़ुर्गी व जलालत के वसीले से के जो न कहनह होती है न मुतग़य्यिर, न तबदील होती है न फ़ना। तुझसे यह सवाल करता हूं के तू मोहम्मद (अ0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अपनी इबादत के ज़रिये हर चीज़ से बेनियाज़ कर दे। और अपने ख़ौफ़ की वजह से दुनिया से दिल बरदाश्ता बना दे और अपनी रहमत से बख़्शिश व करामत की फ़रावानी के साथ मुझे वापस कर इसलिये के मैं तेरी ही तरफ़ गुरीज़ां और तुझ ही से डरता हूं और तुझ ही से फ़रयादरसी चाहता हूं और तुझ ही से उम्मीद रखता हूं और तुझे ही पुकारता हूं और तुझ ही से पनाह चाहता हूं और तुझ ही पर भरोसा करता हूं और तुझ ही से मदद चाहता हूं और तुझ ही पर ईमान लाया हूं और तुझ ही पर तवक्कल रखता हूं और तेरे ही जूद व करम पर एतमाद करता हूं।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 51st dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



 इक्यावनवी दुआ
तज़रूअ व फ़रवतनी के सिलसिले में हज़रत (अ0) की दुआ

 
 
ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी हम्द व सताइश करता हूं और तू हम्द व सताइश का सज़ावार है इस बात पर के तूने मेरे साथ अच्छा सुलूक किया। मुझ पर अपनी नेमतों का कामिल और अपने अतीयों को फ़रावां किया और इस बात पर के तूने अपनी रहमत के ज़रिये मुझे ज़्यादा से ज़्यादा और अपनी नेमतों को मुझ पर तमाम किया। चुनांचे तूने मुझ पर वह एहसानात किये हैं जिनके शुक्रिया से क़ासिर हूं और अगर तेरे एहसानात मुझ पर न होते और तेरी नेमतें मुझ पर फ़रावां न होतीं तो मैं न अपना हिज्ज़ व नसीब फ़राहम कर सकता था और न नफ़्स की इस्लाह व दुरूस्ती की हद तक पहुंच सकता था लेकिन तूने मेरे हक़ में अपने एहसानात का आग़ाज़ फ़रमाया और मेरे तमाम कामों में मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ी अता की। रंज व बला की सख़्ती भी मुझसे हटा दी और जिस हुक्मे क़ज़ा का अन्देशा था उसे मुझसे रोक दिया। ऐ मेरे माबूद! कितनी बलाख़ेज़ मुसीबतें थीं जिन्हें तूने मुझसे दूर कर दिया और कितनी ही कामिल नेमतें थीं जिनसे तूने मेरी आंखों की ख़नकी व सरवर का सामान किया और कितने ही तूने मुझ पर बढ़े एहसानात फ़रमाए हैं। तू वह है जिसने हालते इज़्तेरार में दुआ क़ुबूल की और (गुनाहों में) गिरने के मौक़े पर मेरी लग़्िज़श से दरगुज़र किया और दुश्मनों से मेरे ज़ुल्म व सितम से छने हुए हक़ को ले लिया। बारे इलाहा! मैंने जब भी तुझसे सवाल किया तुझे बख़ील और जब भी तेरी बारगाह का क़स्द किया तुझे रन्जीदा नहीं पाया। बल्कि तुझे अपनी दुआ की निस्बत सुनने वाला और अपने मक़ासिद का बर लाने वाला ही पाया। और मैंने अपने अहवाल में से हर हाल में और अपने ज़मानाए (हयात) के हर लम्हे में तेरी नेमतों को अपने लिये फ़रावां पाया। लेहाज़ा तू मेरे नज़दीक क़ाबिले तारीफ़ और तेरा एहसान लाएक़े शुक्रिया है। मेरा जिस्म (अमलन) मेरी ज़बान (क़ौलन) और मेरी अक़्ल (एतेक़ादन) तेरी हम्द व सिपास करती है। ऐसी हम्द जो हद्दे कमाल और इन्तेहाए शुक्र पर फ़ाएज़ हो। ऐसी हम्द जो मेरे लिये तेरी ख़ुशनूदी के बराबर हो। लेहाज़ा मुझे अपनी नाराज़गी से बचा। ऐ मेरे पनाहगाह जबके (मुतज़र्क़) रास्ते मुझे ख़स्ता व परेशान कर दें। ऐ मेरी लग़्िज़शों के माफ़ करने वाले अगर तू मेरी पर्दापोशी न करता तो मैं यक़ीनन रूसवा होने वालों में से होता। ऐ अपनी मदद से मुझे तक़वीयत देने वाले अगर तेरी मदद शरीके हाल न होती तो मैं मग़ावब व शिकस्त ख़ोरदा लोगों में से होता। ऐ वह जिसकी बारगाह में शाहों ने ज़िल्लत व ख़्वारी का जोवा अपनी गर्दन में डाल लिया है और वह उसके ग़लबे व इक़्तेदार से ख़ौफ़ज़दा हैं। ऐ वह जो तक़वा का सज़ावार है ऐ वह के हुस्न व ख़ूबी वाले नाम बस उसी के लिये हैं, मैं तुझसे ख़्वास्तगार हूं के मुझसे दरगुज़र फ़रमा और मुझे बख़्श दे, क्योंके मैं बेगुनाह नहीं हूं के उज़्र ख़्वाही करूं और न ताक़तवर हूं के ग़लबा पा सकूं और न गुरेज़ की कोई जगह है के भाग सकूं। मैं तुझसे अपनी लग्ज़िशों की माफ़ी चाहता हूं और उन गुनाहों से जिन्होंने मुझे हलाक कर दिया है और मुझे इस तरह घेर लिया है के मुझे तबाह कर दिया है, तौबा व माज़ेरत करता हूं मैं ऐ मेरे परवरदिगार! उन गुनाहों से तौबा करते हुए तेरी तरफ़ भाग खड़ा हूं तो अब मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा, तुझसे पनाह चाहता हूं। मुझे पनाह दे, तुझसे अमान मांगता हूं मुझे ख़्वार न कर तुझसे सवाल करता हूं मुझे महरूम न कर, तेरे दामन से वाबस्ता हूं मुझे मेरे हाल पर छोड़ न दे, और तुझसे दुआ मांगता हूं लेहाज़ा मुझे नाकाम न फेर। ऐ मेरे परवरदिगार! मैंने ऐसे हाल में के मैं बिल्कुल मिस्कीन आजिज़, ख़ौफ़ज़दा, तरसां, हरासां, बेसरो सामान और लाचार हूं, तुझे पुकारा है। ऐ मेरे माबूद! मैं इस अज्र व सवाब की जानिब जिसका तूने अपने दोस्तों से वादा किया है जल्दी करने और उस अज़ाब से जिससे तूने अपने दुश्मनों को डराया है दूरी इख़्तियार करने से अपनी कमज़ोरी और नातवानी का गिला करता हूं तेज़ अफ़कार की ज़ियादती और नफ़्स की परेशान ख़याली का शिकवा करता हूं। ऐ मेरे माबूद! तू मेरी बातेनी हालत की वजह से मुझे रूसवा न करना। और मेरे गुनाहों के बाएस मुझे तबाह व बरबाद न होने देना। मैं तुझे पुकारता हूं तो तू मुझे जवाब देता है और जब तू मुझे बुलाता है तो मैं सुस्ती करता हूं और मैं जो हाजत रखता हूं तुझसे तलब करता हूं और जहां कहीं होता हूं अपने राज़े दिली तेरे सामने आश्कारा करता हूं और तेरे सिवा किसी को नहीं पुकारता और न तेरे अलावा किसी से आस रखता हूं। हाज़िर हूं! मैं हाज़िर हूं! जो तुझसे शिकवा करे तू उसका शिकवा सुनता है और जो तुझ पर भरोसा करे उसकी तरफ़ मुतवज्जो होता है। और जो तेरा दामन थाम ले उसे (ग़म व फ़िक्र) से रेहाई देता है। और जो तुझसे पनाह चाहे उससे ग़म व अन्दोह को दूर कर देता है। ऐ मेरे माबूद! मेरे नाशुक्रेपन की वजह से मुझे दुनिया व आख़ेरत की भलाई से महरूम न कर और मेरे जो गुनाह जो तेरे इल्म में हैं बख़्श दे। और अगर तू सज़ा दे तो इसलिये के मैं ही हद से तजावुज़ करने वाला सुस्त क़दम, ज़ियांकार, आसी, तक़सीर पेशा, ग़फ़लत शुआर और अपने हज़ा व नसीब में लापरवाही करने वाला हूं और अगर तू बख़्शे तो इसलिये के तू सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है। 
 

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 50th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



पचासवीं दुआ
ख़ौफ़े ख़ुदा के सिलसिले में हज़रत की दुआ



बारे इलाहा! तूने मुझे इस तरह पैदा किया के मेरा आज़ा बिल्कुल सही व सालिम थे, और जब कमसिन था, तो मेरी परवरिश का सामान किया और बे रन्ज व काविश रिज़्क़ दिया। बारे इलाहा! तूने जिस किताब को नाज़िल किया और जिसके ज़रिये अपने बन्दों को नवेद व बशारत दी, उसमें तेरे इस इरशाद को देखा है के ‘‘ऐ मेरे बन्दों! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है, तुम अल्लाह तआला की रहमत से ना उम्मीद न होना। यक़ीनन अल्लाह तुम्हारे तमाम गुनाह मुआफ़ कर देगा’’ इससे पेशतर मुझसे ऐसे गुनाह सरज़द हो चुके हैं जिनसे तू वाक़िफ़ है और जिन्हें तू मुझसे ज़्यादा जानता है। वाए बदबख़्ती व रूसवाई उन गुनाहों के हाथों जिन्हें तेरी किताब क़लमबन्द किये हुए है अगर तेरे हमहगीर अफ़ो व दरगुज़र के वह मवाक़ेअ न होते जिनका मैं उम्मीदवार हूं तो मैं अपने हाथों अपनी हलाकत का सामान कर चुका था। अगर कोई एक भी अपने परवरदिगार से निकल भागने पर क़ादिर होता तो मैं तुझसे भागने का ज़्यादा सज़ावार था। और तू वह है जिससे ज़मीन व आसमान के अन्दर कोई राज़ मख़फ़ी नहीं है मगर यह के तू (क़यामत के दिन) उसे ला हाज़िर करेगा। तू जज़ा देने और हिसाब करने के लिये बहुत काफ़ी है। ऐ अल्लाह! मैं अगर भागना चाहूं तो तू मुझे ढूंढ लेगा, अगर राहे गुरेज़ इख़्तियार करूं, तो तू मुझे पा लेगा। ले देख मैं आजिज़, ज़लील और शिकस्ता हाल तेरे सामने खड़ा हूं, अगर तू अज़ाब करे तो मैं उसका सज़ावार हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! यह तेरी जानिब से ऐन अद्ल है और अगर तू मुआफ़ कर दे तो तेरा अफ़ो व दरगुज़र हमेशा मेरे शामिले हाल रहा है। और तूने सेहत व सलामती के लिबास मुझे पहनाए हैं। बारे इलाहा! मैं तेरे उन पोशीदा नामों के वसीले से और तेरी उस बुज़ुर्गी के वास्ते से जो (जलाल व अज़मत के) पर्दों  में मख़फ़ी है  तुझसे यह सवाल करता हूं के इस बेताब नफ़्स और बेक़रार हड्डियों के ढांचे पर तरस खा (इसलिये के) जो तेरे सूरज की तपिश को बरदाश्त नहीं कर सकता वह तेरे जहन्नुम की तेज़ी को कैसे बरदाश्त करेगा और जो तेरे बादल की गरज से कांप उठता है तो वह तेरे ग़ज़ब की आवाज़ को कैसे सुन सकता है। लेहाज़ा मेरे हाले ज़ार पर रहम फ़रमा इसलिये के ऐ मेरे माबूद! मैं एक हक़ीर फ़र्द हूं जिसका मरतबा पस्ततर है और मुझ पर अज़ाब करना तेरी सल्तनत में ज़र्रा भर इज़ाफ़ा नहीं कर सकता और अगर मुझे अज़ाब करना तेरी सल्तनत को बढ़ा देता तो मैं तुझसे अज़ाब पर सब्र व शिकेबाई का सवाल करता और यह चाहता के वह इज़ाफ़ा तुझे हासिल हो। लेकिन ऐ मेरे माबूद! तेरी सल्तनत इससे ज़्यादा अज़ीम और इससे ज़्यादा दवाम पज़ीद है के फ़रमांबरदारों की इताअत इसमें कुछ इज़ाफ़ा कर सके या गुनहगारों की मासियत इसमें से कुछ घटा सके। तो फिर ऐ तमाम रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले मुझ पर रहम फ़रमा और ऐ जलाल व बुज़ुर्गी वाले मुझसे दरगुज़र कर और मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा। बेशक तू तौबा क़ुबूल करने वाला और रहम करने वाला है।

Sahifa-e-Kamila, Sajjadia 49th dua (urdu tarjuma in HINDI) by imam zainul abedin a.s.



उनचासवीं दुआ
दुश्मनों के मक्रो फ़रेब के दफ़ीया और उनकी शिद्दत व सख़्ती को दूर करने के लिये हज़रत की दुआ


ऐ मेरे माबूद! तूने मेरी रहनुमाई की मगर मैं ग़ाफ़िल रहा, तूने पन्द व नसीहत की मगर मैं सख़्तदिली के बाएस मुतास्सिर न हुआ। तूने मुझे उमदा नेमतें बख़्शीं, मगर मैंने नाफ़रमानी की। फिर यह के जिन गुनाहों से तूने मेरा रूख़ मोड़ा जबके तूने मुझे इसकी मारेफ़त अता की तो मैं ने (गुनाहों की बुराई को) पहचानकर तौबा व अस्तग़फ़ार की जिस पर तूने मुझे माफ़ कर दिया और फिर गुनाहों का मुरतकिब हुआ तो तूने पर्दापोशी से काम लिया ऐ मेरे माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सना है। मैं हलाकत की वादियों में फान्दा और तबाही व बरबादी की घाटियों में उतरा। इन हलाकतख़ेज़ घाटियों में तेरी क़हर मानी सख़्तगीरियों और उनमें वर आने से तेरी उक़ूबतों का सामना किया तेरी बारगाह में मेरा ववसीला तेरी वहदत वव यकताई का इक़रार है। और मेरा ज़रिया सिर्फ़ यह है के मैंने किसी चीज़ को तेरा शरीक नहीं जाना और तेरे साथ किसी को माबूद नहीं ठहराया। और मैं अपनी जान को लिये तेरी रहमत व मग़फ़ेरत की जानिब गुरीज़ां हूं। और एक गुनहगार तेरी ही तरफ़ भागकर आता है और एक इल्तेजा करने वाला जो अपने ख़त व नसीब को ज़ाया कर चुका हो तेरे ही दामन में पनाह लेता है कितने ही ऐसे दुश्मन थे जिन्होंने शमशीरे अदावत को मुझ पर बेनियाम किया और मेरे लिये अपनी छुरी की धार को बारीक और अपनी तन्दी व सख़्ती की बाड़ को तेज़ किया और पानी में मेरे लिये मोहलक ज़हरों की आमेज़िश की और कमानों में तीरों को जोड़ कर मुझे निशाने की ज़द पर रख लिया और उनकी तआक़ुब करने वाली निगाहें मुझसे ज़रा ग़ाफ़िल न हुईं और दिल में मेरी ईन्दारसानी के मन्सूबे बान्धने और तल्ख़ जरओं की तल्ख़ी से मुझे पैहम तल्ख़ काम बनाते रहे। तो ऐ मेरे माबूद! इन रन्ज व आलाम की बरदाश्त से मेरी कमज़ोरी और मुझसे आमादा पैकार होने वालों के मुक़ाबले में इन्तेक़ाम से मेरी आजिज़ी और कसीरूततादाद दुश्मनों और ईन्दारसानी के लिये घात लगाने वालों के मुक़ाबले में मेरी तन्हाई तेरी नज़र में थी जिसकी तरफ़ से मैं ग़ाफ़िल और बेफ़िक्र था के तूने मेरी मदद में पहल और अपनी क़ूवत और ताक़त से मेरी कमर मज़बूत की। फिर यह के इसकी तेज़ी को तोड़ दिया और उसके कसीर साथियों (को मुन्तशिर करने) के बाद उसे यको तन्हा कर दिया और मुझे उस पर ग़लबा व सरबलन्दी अता की और जो तीर उसने अपनी कमान में जोड़े थे वह उसी की तरफ़ पलटा दिये। चुनांचे इस हालत में तूने उसे पलटा दिया के न तो वह अपना ग़ुस्सा ठण्डा कर सका और न उसके दिल की पेश फ़रो हो सकी, उसने अपनी बोटियां काटीं और पीठ फिराकर चला गयाा और उसके लश्करवालों ने भी इसे दुनिया दी और कितने ही ऐसे सितमगर थे जिन्होंने अपने मक्रो फ़रेब से मुझ पर ज़ुल्म व तादी की और अपने शिकार के जाल मेरे लिये बिछाए और अपनी निगाहे जुस्तजू का मुझ पर पहरा लगा दिया और इस तरह घात लगाकर बैठ गए जिस तरह दरन्दह अपने शिकार के इन्तेज़ार में मौक़े की ताक में घात लगाकर बैठता है। दरआंहालिया के वह मेरे सामने ख़ुशामदाना तौर पर ख़न्दह पेशानी से पेश आते और (दर पर्दा) इन्तेहाई कीनातोज़ नज़रों से मुझे देखते तो जब ऐ ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर उनकी बद बातेनी व बदसरिश्ती को देखा तो उन्हें सर के बल उन्हीं के गढ़े में उलट दिया और उन्हें उन्हीं के ग़ार के गहराव में फेंक दिया, और जिस हाल में मुझे गिरफ्तार देखना चाहते थे ख़ुद ही ग़ुरूर व सरबलन्दी का मुज़ाहेरा करने के बाद ज़लील होकर उसके फन्दों में जा पड़े अैर सच तो यह है के अगर तेरी रहमत शरीके हाल न होती तो क्या बईद था के जो बला व मुसीबत उन पर टूट पड़ी है वह मुझ पर टूट पड़ती और कितने ही ऐसे हासिद थे जिन्हें मेरी वजह से ग़म व ग़ुस्से के उच्छू और ग़ैज़ व ग़ज़ब के गुलूगीर फन्दे लगे और अपनी तेज़ ज़बानी से मुझे अज़ीयत देते रहे और अपने उयूब के साथ मुझे मोतहिम करके तैश दिलाते रहे और मेरी आबरू को अपने तीरों का निशाना बनाया और जिन बुरी आदतों में वह ख़ुद हमेशा मुब्तिला रहे वह मेरे सर मण्ढ दें और अपनी फ़रेबकारियों से मुझे मुश्तअल करते और अपनी दग़ाबाज़ियों के साथ मेरी तरफ़ पर तोलते रहे तो मैंने ऐ मेरे अल्लाह तुझसे फ़रयादरसी चाहते हुए और तेरी जल्द हाजत रवाई पर भरोसा करते हुए तुझे पुकारा दरआंहालिया के यह जानता था के जो तेरे सायाए हिमायत में पनाह लेगा वह शिकस्त ख़ोरदा न होगा और जो तेरे इन्तेक़ाम की पनाहगाहे मोहकम में पनाहगुज़ीं होगा, वह हरासां नहीं होगा, चुनांचे तूने अपनी क़ुदरत से उनकी शिद्दत व शर अंगेज़ी से मुझे महफ़ूज़ कर दिया और कितने ही मुसीबतों के अब्र (जो मेरे अफ़क़े ज़िन्दगी पर छाए हुए) थे तूने छांट दिये और कितने ही नेमतों के बादल बरसा दिये और कितनी ही रहमत की नहरें बहा दीं और कितने ही सेहत व आफ़ियत के जामे पहन दिये, और कितनी ही आलाम व हवादिस की आंखें (जो मेरी तरफ़ निगरान थीं) तूने बेनूर कर दीं और कितने ही ग़मों के तारीक पर्दे (मेरे दिल पर से) उठा दिये और कितने ही अच्छे गुमानें को तूने सच कर दिया और कितने ही तही वसीयतों का तूने चारा किया और कितनी ही ठोकरों को तूने संभाला और कितनी ही नादारियों को तूने (सरवत से) बदल दिया। (बारे इलाहा! ) यह सब तेरी तरफ़ से इनआम व एहसान है और मैं इन तमाम वाक़ेयात के बावजूद तेरी मासीयतों में हमहतन मुनहमिक रहा। (लेकिन) मेरी बदआमालियों ने तुझे अपने एहसानात की तकमील से रोका नहीं और न तेरा फ़ज़्ल व एहसान मुझे उन कामों से जो तेरी नाराज़गी का बाएस हैं बाज़ रख सका और जो कुछ तू करे उसकी बाबत तुझसे पूछगछ नहीं हो सकती। तेरी ज़ात की क़सम! जब भी तुझसे मांगा गया तूने अता किया और जब न मांगा गया तो तूने अज़ख़ुद दिया। और जब तेरे फ़ज़्ल व करम के लिये झोली फैलाई गई तो तूने बुख़ल से काम नहीं लिया। ऐ मेरे मौला व आक़ा! तूने कभी एहसान व बख़्शिश और तफ़ज़्ज़ुल व इनआम से दरीग़ नहीं किया और मैं तेरे मोहर्रमात में फान्दता तेरे हुदूद व एहकाम से मुतजाविज़ होता और तेरी तहदीद व सरज़न्श से हमेशा ग़फ़लत करता रहा। ऐ मेरे माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सताइश है जो ऐसा साहबे इक़्तेदार है जो मग़लूब नहीं हो सकता। और ऐसा बुर्दबार है जो जल्दी नहीं करता। यह उस शख़्स का मौक़फ़ है जिसने तेरी नेमतों की फ़रावानी का एतराफ़ किया है और उन नेमतों के मुक़ाबले में कोताही की है और अपने खि़लाफ़ अपनी ज़ियांकारी की गवाही दी है। ऐ मेरे माबूद! मैं मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम) की मन्ज़िलत बलन्द पाया और अली (अलैहिस्सलाम) के मरतबए रौशन व दरख़्शां के वास्ते से तुझसे तक़र्रूब का ख़्वास्तगार हूं और उन दोनों के वसीली से तेरी तरफ़ मुतवज्जो हूं। ताके मुझे उन चीज़ों की बुराई से पनाह दे जिनसे पनाह तलब की जाती है। इसलिये के यह तेरी तवंगरी व वुसअत के मुक़ाबले में दुश्वार और तेरी क़ुदरत के आगे कोई मुश्किल काम नहीं है और तू हर चीज़ पर क़ादिर है। लेहाज़ा तू अपनी रहमत और दाएमी तौफ़ीक़ से मुझे बहरामन्द फ़रमा के जिसे ज़ीना क़रार देकर तेरी रज़ामन्दी की सतह पर बलन्द हो सकूं और उसके ज़रिये तेरे अज़ाब से महफ़ूज़ रहूं। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे बढ़कर रहम करने वाले।